Thursday, 7 May 2015

मै पति की तरफ बार-बार देखती रही, पर उन्होंने मेरी तरफ एक बार भी नही देखा!

इस  भारतवर्ष में ऐसी कितनी बेटियां दहेज के कारण ससुराल में अपनी जिन्दगी दाव पर लगाने के लिए हासिल पर खड़ी रहेगी ऐसी ही अनगिनत कहानियों में एक कहानी मालती की जुबानी-
        मेरा नाम मालती है उम्र-22 वर्ष, मेरे पिता प्रकाश हैं मैं ग्राम-बहेरा, थाना-करमा, ब्लाक-करमा, तहसील-राबटर्सगंज, जिला-सोनभद्र की रहने वाली हूँ।
        मेरी शादी 21 जून, 2012 को कन्हैया पुत्र-इद्रबहादुर, ग्राम-करकीमैना, थाना-करमा, ब्लाक-करमा, तहसील-राबटर्सगंज, जिला-सोनभद्र में हूँ। मेरे माँ-बाप ने अपनी हैसियत से अधिक स्त्री-धन एवं उपहार मुझे दिया गया था। 22 जून को जब मैं अपने ससुराल गयी तब मेरे मन में बहुत से सपने सजे थे। वहाँ जाने के बाद दो दिन तक मुझसे कुछ ठीक-ठाक ब्यवहार किया गया। नयी जगह होने के कारण मैं भी अपने आपको वहाँ के अनुरुप ढाल रही थी। तभी तीसरे दिन मेरा भ्रम टुट गया। मेरे पति मेरे कमरे में आये और मुझसे बिना कुछ बोले सो गये। मैं उनकी तरफ बार-बार देखती कि कुछ कहेगें लेकिन उन्होने मेरी तरफ एक बार भी नहीं देखा। यह देखकर मेरा मन बहुत दुखी हुआ, मेरे सारे सपने टुट गये। बहुत देर तक इधर-उधर करवटें बदले मैं भी सो गयी।
       सुबह उठनें पर मैं घर के झाडु-बर्तन में लग गयी। कुछ देर बीत जाने के बाद मेरी सास लाची, ससुर, पति व देवर सभी मुझे ताना देने लगे कि तुम्हारी माँ ने टी0वी0, पंखा कुछ भी नहीं दिया। मेरी माँ-बाप को गंदी-गंदी गालियां दे रहे थे। मैं चुपचाप सुन रही थी। उस समय मुझे बहुत बुरा लग रहा था। उस समय मुझे बहुत तकलीफ हो रही थी। तभी मेरी सास लाठी लेकर मुझे मारने लगी। यह देखकर मैं सन्न रह गयी। घर के और लोग खड़े होकर देख रहे थे। मैं चुपचाप मार खा रही थी और रो रही थी। उस समय मुझे घर की बहुत याद आ रही थी।
      मेरे हाथ पर तीन लाठी कमर पर दो-तीन लाठी और मेरे पैरो पर भी तीन-चार लाठी मारी। मैं दर्द से चिल्ला रही थी। लेकिन खडे़ लोगों ने मेरी कोई मदद नहीं की। मेरा पुरा बदन दर्द कर रहा था। जगह-जगह खुन जम गया था। मैं रोते बिलखते लगड़ाते हुए मौका मिलते ही अपने पति के फोन से घर (मायके) वालों को खबर दी। मेरे रोने की आवाज सुनकर वो लोग मुझे लेने आये। मेरे मायके चुपचाप मुझे लेकर घर आये|उस समय मुझे बहुत तकलीफ थी। पुरा बदन फोड़े की तरफ दर्द कर रहा था। घर में हल्दी लगाया गया। फिर पैसे का इन्तजाम कर दवा दिलाने ले गयी। मुझसे चला जा रहा था।
       कई दिनों तक दवा इलाज करने के बाद मुझे कुछ आराम मिला। मेरी हालत देखकर घर वाले भी परेशान थे। आप-पड़ोस के लोग भी तरह-तरह की बात कर रहे थे। उस समय मुझे लगता कि अगर मैं अच्छी तरह से ससुराल से आती तो लोगों से हंसती-बोलती लेकिन इस हालत में किससे क्या हंसु और बोले। इन चार दिनों में ससुराल में रोने और मार के अलावा कुछ भी नहीं मिला।
      3-4 महिनें में जब ठीक हुई तब वह लोग विदाई की मांग करने लगे। मेरी माँ ने कहा दिसम्बर (अगहन) में विदाई करेंगे। तब वह जबरदस्ती अक्टूबर में ही विदाई मांगने लगें। कहे अगहन में टी0वी0, पंखा और सब कुछ देना होगा यह सुनकर गरीबी के कारण घर वाले दशहरा के बीत जाने के बाद मुझे विदा कर दिया।
वहां जाने के बाद फिर वह लोग मुझे परेशान करने लगे। मेरे पति शराब पीकर आते, मुझसे बाते नहीं करते जब मैं कहती क्यों पीते है तो कहते कि तुम्हारे माँ-बाप नहीं दिये हैं। मैं अपने पैसे का पी रहा हुँ। मेरे माँ-बाप ने तुम्हें देखकर शादी की है, तु मेरी पसन्द नही है, यह सब कह कर सो जाते। मैं इन सब बातों सुनती और सारी रात सोचती की नहीं रखना था तो मुझे क्यों लायें। सुबह उठकर सास के ताने कि तेरे माँ-बाप कुछ नहीं दिये हैं। तुझे भी हम नहीं रखेंगे। नहीं जाओगे तो हमलोग मिट्टी का तेल छिड़कर जला देंगे। यह सब दिन-रात सुनते-सुनते मैं पागल सी हो गयी थी। खाना-पिना कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था।
     3-4 दिनों तक सब कुछ सहती रही। मेरी बड़ी बहन के बच्चे मुझसे मिलने आये थे। उन्हे अपने ऊपर हुई परेशानीयों के बारे में बताया। उन लोगों ने माँ को फोन कर सब कुछ बताया। फिर मेरे माँ-बाप मेरी दुख-भरी बातों को सुनकर मुझे लेने आये। उस दिन से आज तक मैं मायके में हूँ उन लोगों ने मेरी कोई खबर नहीं ली। मैं यहीं बनी-मजदूरी कर अपना पेट चला रही हूँ। आस-पास के लोग भी मेरे बारे में तरह-तरह की बाते करते हैं। मुझसे अधिक काम नहीं हो पाता। मार के कारण ज्यादा देर तक काम हूँ तो हाव-पैर दर्द करता है। फिर भी किसी तरह थोड़ा बहुत काम कर गुजारा करती हूँ। मुझे आने-जाने का कहीं भी मन नहीं करता।
       मेरी जिन्दगी में उदासी सी छा गयी है। कुछ भी अच्छा नहीं लगता। मैं चाहती हुँ कि अगर वह लोग मुझे ठीक से रखें, मेरे पति मुझे अपनी पत्नी स्वीकार कर ले और मारे-पिटे नही तब मैं उनके साथ रहने जो तैयार हूँ। मैं दुसरी शादी नहीं करना चाहती।

साक्षात्कारकर्ता-पिन्टू कुमार गुप्ता
संघर्षरत पीड़िता-मालती देवी