Thursday, 7 May 2015

“अब इस बच्ची का क्या होगा उस जानवर ने पता नही उसके साथ क्या हुआ”

गरीबी एक अभिशाप है हर कोई उसकी इज्जत को तार-तार करने की कोशिश करता रहता है। उसे लगता है, वह उसकी जागीर है, वह जैसे चाहे उसका इस्तेमाल कर या उसके जान-माल का नुकसान करे ऐसी ही दुखीयारी की कहानी उसी की जुबानी

मैं फुल्ला देवी हूँ, मेरी उम्र-50 वर्ष है, मेरे पति स्व0 रामराज पटेल है, मैं ग्राम-डभाव, पोस्ट-डांडी, थाना-नैनी, ब्लाक-चाका, तहसील-करछना, जिला-इलाहाबाद की मूल निवासिनी हूँ। मेरे चार बच्चे है, विजयलक्ष्मी जो शादी शुदा है, दुसरा बेटा रोहित उम्र-25 वर्ष जो हल्के दिमांग है। वह भी शादी शुदा है। तीसरा बेटा अक्षय लाल उम्र-20 वर्ष जो कई महिनों से एक्सीडेन्ट के कारण बीमार है। वह बिस्तार पर पड़ा है। छोटी बेटी शालिनी उम्र-18 वर्ष यही दोनों अविवाहित है। मैं बहुत ही गरीब हूँ। मेरा कच्चा घर है, मैं भूमिहीन मजदूर हूँ, मैं अशिक्षीत हूँ। गरीबी के कारण मैं बच्चों को अधिक नही पढ़ा पाई।
रोज की तरह उस दिन भी मजदूरी करने के बाद बेटे को देखने दादुपुर कर्मा अस्पताल गयी मेरे साथ मेरी पोती आचल भी गयी थी। बेटे को देखने के बाद मैं जब घर आने लगी तो रोड़ पर रुककर अपने बेटे को खाने के लिए सब्जी खरीदने लगी रोड़ से घर की दुरी थोड़ी होने की वजह से हम सोचे कि आचल घर चली गयी| जब मैं सब्जी लेकर घर पहुँची तो बोली बिट्टी कहा है तब मेरी बहू बेटी ने कहा वह आप के साथ गयी थी। यह सुनकर मैं उल्टे पाँव गयी उस समय काफी समय हो गयी थी, अन्धेरा हो गया था। मैं उसको चिल्लाते हुए आवाज लगाते ढुढ़ रही थी तभी मेरी निगाह खेत की ओर पड़ी मैंने देखा आरोपी रमेश उम्र-36 वर्ष पुत्र-रामसुचित उसका हाथ पकड़कर ले जा रहा था। बच्ची के नाक से खुन निकल रहा था। मै उसे देखकर घबराकर उसकी तरफ दौड़ी तब आरोपी का रुमाल मेरे हाथ में आ गया वह जबरदस्ती छुड़ाकर बच्ची को छोड़कर गाँव की ओर भागा! बच्ची खुन से लथपत थी यह सब देखकर मेरे होश उड़ गये| मैं गाँव वालो को आवाज देकर मदद के लिए चिल्लायी बच्ची गिरी जा रही थी उसके मुँह से सिर्फ पानी के लिए आवाज निकल रहा था। उसकी हालत देखकर मुझे गश्ती आ रही थी। गाँव वालो ने मना किया उसे पानी मत दो इस बच्ची की हालत देखकर गाँव वाले भी धबरा गये मै। उस समय यही सोच रही थी अगर वह मेरे साथ आयी होती तो ऐसा नही होता अब बच्ची का क्या होगा उस जानवर ने पता नही उसके साथ क्या-क्या किया है। मेरे जेठ के लड़के और दो तीन लोग उसे एग्रीकल्चर चौकी लेकर भागे वहाँ से उसे डर्फास भेजा गया बहुत देर बीतने के बाद दो गाड़ी पुलिस की आयी उन लोगों ने मेरी गरीबी के कारण कोई सक्रियता नही दिखाई। आरोपी की इस हरकत से गाँव वालों में नाराजगी थी। उनका कहना था कि अगर इसी तरह वह किसी और की बहू बेटियों के साथ करेगा तो कैसे लोग सुरक्षित रहेगे। उसने गाय बछ़डो को नही छोड़ा है। कितनो की जान चली गयी है। उनके परिवार के पास पैसा है। वह देकर उसे बचा लेते है। यह सब दुखी होकर सभी न्याय की माँग करने लगे तब पुलिस वालों ने लाठी भाजनी शुरु कर दी फायरिंग भी किया। पुलिस को ऐसा करता देख लोग भांगने लगे अपना बचाव करने लगे। आरोपी भी उसी गाँव का है। पता नही किन लोगों ने पुलिस की गाड़ी को फुका और पथराव किया। उस समय जो माहौल था उसमें पुलिस की भी गलती थी उनको शान्ती से निपटाना चाहिए था। लेकिन कुछ भी ऐसा नही हुआ पाँच लोगों की गिरफ्तारी की गयी 27 लोगों को नामजद किया गया गाँव की जनता हमारी मदद के लिए आयी थी पता नही उसमें से कौन आपत्ति जनक लोगों ने मामले को तौल दिया।
इस हरकत से हम लोगों को बहुत परेशानी हुई बच्ची अस्पताल में थी वहाँ से बार-बार उसे बाहर किया जा रहा था। वहाँ पर पुलिस भी हमें धमका रही थी। एक बार तो घर भेज दिये| फिर सीरियस हो गयी तो मै दौड़कर उसे हस्पताल में भर्ती किया। बच्ची ने बयान दिया वह कह रही थी की तुम्हे जान से मार देगे पहले वह नाक पर मारा फिर उसका पेट मरोड़ रहा था पता नही वह उसके साथ क्या करता अगर मैं समय से नही पहूँचती तो उसे ले जाकर उसे बच्ची के साथ गलत करके उसे मार देता। गरीबी की कही सुनवाई नही है हर जगह उनके साथ अत्याचार होता है। हमारी कही सुनवाई नही हुई बच्ची के पेट में दर्द होता है। नन्ही की बच्ची के साथ वह आधे घण्टे तक उसे मारता-पिटता रहा और सताता रहा वह दरिन्दा है जब वह जानवर को नही छोड़ता इसमें उसके घर वालों का पूरा सहयोग है। वह हमारे ही परिवार का है, लेकिन गरीबी और अमीरी के कारण एक दुसरे से अधिक सम्बन्ध नही है। वह पैसे वाले लोग है। गाँव वालों ने हमारी गरीबी को देखकर सहारा दिया तब उन्ही पर पुलिस इल्जाम लगाकर बन्द कर रही है और लोगों के तलाश में दबिश दे रही है। सभी लड़के भागे-भागे फिर रहे है। सब मजदूर है, उनके परिवार का बुरा हाल है। मुझे यह सब देखकर बहुत पछतावा हो रहा है मेरी वजह से सब परेशान है। पुलिस वाले गलती नही देख रहे है। बे-कसुर जनता को परेशान कर रहे है। उस दिन मुसलमान का त्योहार था बेचारा एक मुसलमान वह भी फंस गया| वह तो यहा का बशिन्दा भी नही था| इसी तरह गाँव के बिरादर व गैर बिरादर सब को वह लोग ले गये है।
इसी डर से मैं थाने नही जा रही हूँ। पता नही शिकायत दर्ज हुआ कि नही मेडिकल हुआ इन सब की कोई कापी मेरे पास नही है। मेरे पूरे मामले को इन लोगों ने दबा दिया है। अब मेरा कोई सहारा नही है। चारो तरफ अधेरा दिख रहा है। भगवान का ही सहारा है। बस यही दिन रात सोचती हूँ। हमारी जनता छुट जाये वह हमारी वजह से परेशान है, बार-बार दिल यही कहता है कि लोग हमारी कारण फंसे है। वह हमारे बारे में क्या सोचते है। यही फिक्र सताये जा रही है।
घर में दो वक्त की रोटी इकट्ठा करना मुश्किल होता है। इस फिक्र के मारे मन नही लगता हमेशा बेचैनी सी रहती है दिन रात जागकर गुजरता है। जब तक यह लोग छुट न जाये तब तक हमें सुकून नही मिलेगा। उसके दुर्व्यहार के कारण बच्ची भी पेट में दर्द की शिकायत हमेशा करती रहती है। समझ में नही आ रहा है। क्या करु/बदनामी भी हुई और हमारी जनता गाँव के लोग परेशानी में पड़ गये हमारी वजह से यही सब चिन्ता है। इन्ही कारण त्योहार रक्षा बन्धन सब बीत गया कोई लोग नही मनाये गाँव में मातम सा छाया था। लोगों की रोजी रोटी पर असर पड़ रहा है।
मैं चाहती हूँ जिन लोगों ने ऐसा किया है। उनके खिलाफ सक्त कार्यवाही हो जिससे बेकसुर लोग छुट जाये पुलिस हमारी मदद के लिए है लेकिन वह हमारी मदद नही करती है। वह गरीबी के साथ अन्याय करती है।

साक्षात्कारकर्ता - फरहद शाबा खानम
संघर्षरत पीडिता - फुल्ला देवी