Friday, 22 May 2015

पुलिस का मार से डर लगता है!

आजादी के इतने वर्ष गुजार जाने के बाद पुलिस की स्थिति वैसे ही है। वह डंडे के बल पर जुर्म कबुल करवाते है। वह एक आम आदमी को बेगुनाह को गुनहगार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते है। इससे यह लगता है कि वह जनता की रक्षक नही बल्कि अन्याय का सौदागर है। ऐसे ही एक मजदूर की कहानी उसकी जुबानी।
मैं बिहारी लाल उम्र-30 वर्ष है। मेरे पिता का नाम स्व0 श्री हीरा लाल है। मैं अशिक्षित हूँ। मैं बनी मजुदरी करता हूँ। मेरे पास छः बच्चें है। अजंली-10 वर्ष, प्रतीमा-9 वर्ष, शालू-7 वर्ष, करन-4 वर्ष, कल्पना-3 वर्ष, और गोलू डेढ़ वर्ष का है। मैं जाति का चमार हूँ। मैं ग्राम-सारंगपुर, थाना-घुरपुर, ब्लाक-चाका, तहसील-करहना, जिला-इलाहाबाद की निवासी हूँ।
07 नवम्बर, 2013 को मैं रोज की तरह काम पर से आया और खाना खाकर सो गया था। उस रात मैं अपने साथ हुए इस अनहोनी से बिल्कुल अन्जान था। रात के करीबन 12:001:00 बजे दो या तीन लोगों की चिल्लाने की आवाज आयी, मेरी नींद खुली मैं उठकर बैठ गया। मै सोचने लागा कि इतनी रात को कौन आया होगो। ऐसे अन्जाम आवाज से दरवाजा खोलना भी ठीक नहीं था। मैं छत पर गया, मैं डर के मारे नीचे नही उतरा। उस समय मेरी पत्नी और बच्चे भी उठ गये थे। मै देखा कि दो जीप लालापुर घुरपुर थाने की पुलिस की गाड़ी आयी हुई हैं। मेरी पत्नी पुलिस के डर से दरवाजा नहीं खोली। उन पुलिस वालों ने लात से मारकर मेरा दरवाजा खोल लिया और इधर-उधर पडें सामानों को बिखेरने लगे और डंडा पटकने लगे और पत्नी को गन्दी-गन्दी गालियाँ देने लगे। मेरे बक्से को भी टटोलने लगे, और बोले सारा सामान कहा है। उस समय मुझे समझ में नही आ रहा था कि ये लोग किस सामान के बारे में पूछ रहे है। उस समय बहुत अधिक ठण्डी पड़ रही थी। मैं कपड़ा पहनकर सोया था उन लोगों ने मानपुर के लड़के से मेरी पहचान कराकर मुझे नंगे पाव फाटक के उस पार खड़ी पुलिस की गाड़ी के पास ले गये। मेरी पत्नी व बच्चे रो-रो कर गिड़गिडा रहे थे। यह सब देख मुझे बहुत तकलीफ हो रही थी। उस समय मैं अपने आपको बहुत बेवस महसुस कर रहा था। अपने परिवार को उसी हाल में छोड़कर उन पुलिस वालों के साथ चला गया। लालापुर थाने हमें ले जाया गया। उस समय जब हम थाने पहूँचे तो रात के ढ़ाई बज रह थे। थाने में हमें एक कम्बल मिला था। लेकिन पास में शौचालय से बहुत बदबू आ रहा था। उस समय मुझे अपने घर वालों की फिक्र हो रही थी। किसी तरह रात गुजारे सुबह होने पर चाय पानी मिला। दिन के बारह बजे से पूछताछ शुरु हुई दरोगा साहब ने पूछा सामाना (पम्प मोटर) चुराकर कहाँ रखे हो। मैं बोला साहब हम नही जानते
      उन लोगों ने मानपुर के ठाकुर के यहाँ पम्प मोटर चोरी हुई थी। उसी आरोप में चार लोगों को पकड़ा था। एक तो उसी गाँव का ठाकुर एक गाँव के ही राकेश का रिश्तेदार था। मुझे और गाँव के रामजग सबको एक ही जगह रखा था। ठाकुर के यहाँ से 10.000/- रुपये मिल गये थे। इसलिए उसको नही मारा गया। दरोगा जी ने कहा मोटर कहा चुरा कर रखे हो बता दो नही फंस जाओंगे। हमने कहाँ साहब हम नही जानते तब उन्होंने डंडे से मारा बोला। माल बरामद नही होगा तो बूरी तरह से फंसोगे। मैंने पुलिस की मार के डर से मैंने कबुल लिया। उन्होंने मेरे हाथ पर कई डंडा मारा था। उस समय हाथ बहुत तेज से दर्द कर रहा था। हम लोग लालापुर थाने में थे। इस बात डर के मारे पता नही लगा पा रहे थे कि कहाँ किस थाने में पूछने जाये पकड़कर बन्द कर लेगे तो क्या होगा। मुझे घर की फिक्र लगी थी, इन लोगों के मार से डर भी हर समय लगा रहता। अभी भी सोचता हूँ तो डर जाता हूँ।
तीसरे दिन भाई लोग पता लगाते लालापुर थाने पहुँचे उन्हें देखकर मेरे मन को कुछ ढ़ाढ़स बधां उस दिन भी पूछताछ के नाम पर दरोगा जी हमें मार चुके थे। हमें अपने भाई से थोड़ी देर मिलने दिया गया। फिर दरोगा जी ने मेरे भाई को बताया की तीस चालीस हजार थाने में दे दोगें तो तुम्हारा भाई यही से छुट जायेगा नही तो केस लड़ते-लड़ते थक जाओंगें। यह सुनकर मेरे भाईयों ने रिश्तेदारों की मदद से तेरह हजार रुपया थाना पर दिया गया। इधर-उधर दौड़ धुप में कुल बाईस हजार खर्चा लग गया। बृहस्पतिवार की रात से में बन्द था। सोमवार के शाम के पहर मैं थाने से छुट कर आया। दरोगा साहब ने मेरा नाम काटा या नही हमें पता नही है। जिस ठाकुर का मोटर चोरी हुआ था वह भी थाने में आया था। उसको भी पैसा देकर सुलहनामा किया गया।
 मैं थाने से छुटा तो जैसे जान में जान आयी, थाने में हर समय पुलिस की मार से डर लगता था। जब भी दरोगा जी को देखता डर से काप उठता हूँ। उस समय थाने में जब अपने भाई को देखा तो कलेजा बढ़ गया। अब तो मैं छुट जाऊॅगा। हम कानून के बारे में नही जानते थे। बार-बार दरोगा द्वारा धमकी मिलता की अगर मैं तारीख लगा दुगां तो दौड़ते कचहरी का चक्कर लगाते मर जाओंगें। उस समय ये सब सुनकर मैं बहुत डर गया था। मुझे सब यही लगता की किस तरह मैं उनके चंगुल से छुटु। मैं बिना गुनाह किये फंस गया था। मुझे नही पता था। मैं काम करने के मकसद से राकेश के रिश्तेदार की मदद से गया था। काम भी नही मिला इतना बड़ा इल्जाम हमारे उपर लग गया। इस घटना के बाद मैं बिल्कुल टुट गया हूँ। अब तो आप-पास के लोग भी यही समझते है कि मैने चोरी की है। जिस घर का मोटर चोरी हुआ था। उसके घर के बारे में हमें मालूम नही था। मेरे ससुराल वाले और मेरे रिश्तेदार ने पैसे से हमारी मदद की, मुझ पर बाईस हजार का कर्ज हो गया था। लेकिन पिता की दुर्घटना कें मौत होने से जो मुआवजा मिला था। हम दोनों भाईयों को 25-25 हजार रुपया मिला था। उसी से यह कर्ज चुका दिया। पैसा नही होता तो हम गरीब किस तरह कर्ज चुकाते और कैसे अपना पेट पालते इस हादसे ने हमें एकदम तोड़कर रख दिया है। अब हर समय डर लगा रहता है। रात को सोता हूँ। तो नींद नही आती। इस घटना से बच्चें इतना डर गया है कि दिन-रात यही सवाल पूछते है कि पुलिस फिर तो नही आयेगी। यही सुनता हूँ तो बहुत तकलीफ होती है कि कैसे इन बच्चों के मन से यह डर निकालू। यही बाते सोच कर घूटता रहता हूँ। रोज-रोज काम भी नही मिलता हम गरीब लोग काम की तलाश में इधर-उधर घुमते रहते है। काम तो रोज नही मिलता लेकिन चोरी का आरोप लग जाता है। आज अगर वह पैसा मेरे पास होता तो उसके मैं अपने बच्चों के परवरीश में लगा पाता लेकिन यही तसल्ली है कि मैं छुट गया हूँ। मेहनत मजदूरी कर बच्चों की परवरीश करुगा। जब मैं थाने में बन्द था तब मेरे भाई ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में चिट्ठी लिखवा कर भेजा था। अभी इसी सम्बंध में सी00 के यहाँ मेरा बयान लिया गया। मैंने वहाँ पर जो सच्चाई थी बता दिया कि मैंने चोरी नही की थी। मुझे फंसाया गया है। अब मैं सिर्फ यह चाहता हूँ कि पुलिस वाले दुबारा हमारे घर हमें पकड़ने न आये। इस घटना ने हमें पूरी तरह तोड़ दिया है। जब मैं थाने से छुट कर आया तब मेरे जिन्दगी पर हमेशा के लिए चोरी का दाग लग गया।
पुलिस ने यह कहा कि पैसा दे देने पर तुम्हारा नाम कट जायेगा। पता नहीं की मेरा नाम थाने से कटा की नही। मै एक गरीब अशिक्षित लोग है।
मैं चाहता हूँ कि दुबारा पुलिस हमारे घर न आये और मुझ गरीब के ऊपर दुबारा अन्याय न हो।

 साक्षात्कारकर्ता - फरहद शबा खानम्                           
 संघर्षरत पीडि़त - बिहारी लाल