Wednesday, 3 June 2015

’’मेरे घर वालो को मेरे मारने की खबर मिली’’

        इस समाज में बरसो से लोग न्याय के लिए जगह-जगह ठोकर खाते है। हर राहपर आने लिए  मुश्किल खड़ी कर दी जाती है। सहारा और हमदर्दी के लिए कोई भी हाथ नही बढ़ाता है। एक गरीब और छोटी जाति का व्यक्ति इसका सबसे बड़ा शिकार है। ऐसी है कठिन डगर न्याय की तलाश में एक मजलूम पीड़ित की कहानी उसी के दर्द को बया करती है।
            मेरा नाम जीत लाल है, मेरी उम्र 38 वर्ष मेरे पिता भाई लाल है। मै ग्राम-नीबी खाई, पोस्ट-करछना, थाना-करछना, ब्लाक व तहसील-करछना, जनपद-इलाहाबाद की मूल निवासी हॅू। मै जाति की चमार हॅू। मैं बनी मजदूरी करता हॅू। मै कक्षा 5 तक पढा हॅू।
            मेरी कहानी यह कि हमको जहा कही भी काम मिलता था। मै जाकर करता हूँ| गाँव हो या गाँव के बाहर। 17 जनवरी, 2013 की बात है। गाँव के बगल में काम कर रहे थे। सुबह के 9:00 बज रहे थे। मैं उनके घर पैसा लेने गया तो तभी सामने के अतुल कुमार, सोनू विपिन और प्रवीण अतुल ने मुझसे काम करने के लिए कहा मै बोला डेबई नाथ के यहा दो दिन काम बचा है उसके बाद मैं आपके यहा करूगा यह सुनते ही वह लोग गुस्से से लाल हो गये मुझे जूता, चप्पल लाठी डन्डे से पीटने लगे। मै चिल्लाने लगा आस-पास लोग खडे होकर लमाशा देख रहे थे। मै अपने आप को बचाने की कोशिश कर रहा था। लेकिन उन लोगो ने मुझे इस तरह घेर रखा था और लगातार मुझ पर वार कर रहे थे। कि मेरा बचना मुश्किल था। उसी मे से एक व्यक्ति ने बोला तो उन लोगो ने उसे तमंचे से मारे, उन लोगो ने मुझे अधमरा कर छोड़ दिया था। पास खड़े लोगों में से कोई भी हिम्मत नहीं दिखायी। उन ठाकुर लोगों के खिलाफ किसी ने आगे आकर मदद नही की! मैं खून से लथपथ था। मेरे घर वाले इन बातो से अन्जान थे। किसी तरह हिम्मत कर उठा। गाँव के प्रधान सोनू पंण्डित के यहा गया वह मुझे पीपल के पेड़ के नीचे हमको लिटाया गया मै दर्द के मारे मेरी जान निकल रही थी। थानेदार साहब एफ0आई0आर नहीं लिख रहे थे। 2:00 बजे तक कहते रहे लेकिन न एफ0आई0आर लिखा गया न मुझे मेडिकल के लिए भेजा गया। जब कोई भी सुनवाई मेरी नहीं हो रही थी। तब प्रधान जी कह चला इलाहाबाद एस0एस0पी के कार्यालय चलो यह सुनकर थानेदार ने मेरी शिकायत लिखी। लेकिन बात-बात में वह सुलह समझौते कराने की बात कर रहे थे। मै अढ गया तब उन लोगो ने मुझे करछना ब्लाक में मेडिकल के लिए भेजा। मेरी हथेली खुल गयी थी। वह हमको इलाहाबाद रेफर कर दिया गया। वहा एस0आर0एन मे मेडिकल हुआ। मेरे घर वालो को खबर मिली की मुझे जान से मार दिया गया। यह सुनकर मेरी बीबी व बच्चें मुझे देखने घटना स्थल पर आये तब उन लोगों द्वारा उन्हे गाली व धमकी दी गयी कि अभी तो बच गया है अब नही छोडेगे। मुझे न पाकर वह लोग घबरा गये वह लोग थाने आये। मेरे भाई व पट्टीदार किसी ने मेरा साथ नहीं दिया। मै उस समय विल्कुल अकेला अपने आप को असहाय महसूस कर रहा था। घटना स्थल पर थाने वाले एक गाड़ी भर कर गये थे लेकिन आरोपी पक्ष का एक भी व्यक्ति नहीं पकड़ा गया। मेडिकल में मेडिकल रिपोर्ट देने के लिए दुसरे दिन बुलाया गया था। मेरी हालत इतनी खराब थी सारा बदन में चोट का निशान था मेरे अन्दर उठने के हिस्मत नही थी। इस कारण मैं नही जा पाया। घटना के दस से पन्द्रह दिन के बीच में क्षेत्राधिकारी करछना के यहा जाने के लिए एक वकील ने मुझे बताया बोला दोनो पक्ष को बुलाया गया है। मै डर के कारण वहा नहीं गया। जब थाने में चोट लेकर इतना झेल रहा था। कोई सुनवाई नहीं हो रही थी तो वहा कौन सुनेगा। उन लोगो द्वारा मुझे बार-बार मामले को दवाने के लिए धमकी मिला रही थी। वह लोग दूसरो से कहलवाते जान से मार देगे वह मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते यह सब सुनकर मै और मेरी परिवार और धबरा जाता था किसी ने हम लोगो का साथ नही दिया। मेरे घर परिवार के सदस्य लोगो ने भी कुछ नही समझा यह सब देखकर कही भी मदद न मिलने के बाद में वहा जाकर अच्छा नहीं लग रहा था।
       हमको बहुत शर्मिन्दगी महसूस हो रही थी। लेकिन मजबूरी थी क्या करता। उस दिन को याद करता हॅू तो मेरे रोय खडे़ हो जाते है। वही रहकर दवा इलाज किया जब हालत में कुछ सुधार आया तो वहा से वापस अपने गाँव आ गया। उस समय आने के बाद इतना खराब लग रहा था कि क्या बताऊ गाँव में कोई मुझे देखे ना इस कारण गाँव से वाहर के रास्ते से होकर जाता था। वह लोग भी मेरी खबर दूसरो से रखते थे कि कही कोई कार्यवाही तो नहीं की जा रही है। वह बहुत मुश्किल का दिन था बार-बार वह घटना आँखो के सामने चलती रहती थी, दो महीने तक मै इधर उधर भागता रहा लेकिन कही से कोई मदद नहीं मिल रही थी। इन आरोपियों का इतना दबाव था कि कोई भी मदद करने के लिए आगे नही आना चाहता था। इसी तरह बीतता गया। दिन रात मै और मेरी पत्नी बच्चे चिंता में लगे रहते हर समय डर लगा रहता था। दो माह बीतने के बाद एक कागज (नोटिस) आया मै इस बारे में बहुत कुछ नहीं जानता था गाँव में किसको दिखाऊ यह सोचकर इलाहाबाद एक वकील से मिला उसे दिखाया उसने बताया उसका पूरा कागज निकलवाया तो बोला तुम्हारा मामला खारिज हो गया है। गाँव के ही लगभग 15-16 लोगो ने तुम्हारे खिलाफ गवाही दी है। उसमें सभी जाति विरादरी के लोग है। उसमें से कुछ लोग हमारी विरादरी के है उन लोगो ने उल्टा ही मेरे खिलाफ गवाही दी है। उसमें से जिन्हे मै जानता था उनसे पूछा तो उन लोगो ने कहा नहीं मैने कोई गवाही नही दी है। कुछ आशिक्षित गवाहदार जिन्हे हस्ताक्षर नहीं करना आता था। उनके भी हस्ताक्षर उस गवाह के कागज में है, उसे देखकर मै और तकलीफ में आ गया। मैं वही खड़ा का खड़ा रह गया था। सोचता रहा इन दुनिया में एक गरीब छोटी विरादरी का मजदूर न्याय की उम्मीद नहीं लगा सकता है। मेडिकल भी सही तरीके से नहीं हो पा रही थी। उस आरोपी का लड़का प्राईवेट अस्पताल जीवन ज्योति में है उसने सरकारी डाक्टर से सम्पर्क करके सभी कुछ दवावा दिया। जब तक उन लोगो ने झूठी गवाही दिलवा नहीं दिया तबसे मामला दवा दिया गया वह हमारे पीछे लगे रहे। जहा मै जाता था वहा वह पहूच जाते थे। जब सब एक साथ हो जाते थे तब गाँव में कहते है अरे उसको मारा उसने मेरा कुछ नही बिगाड़ा यह कहकर हॅसते हुए जाते है जब सुनता हॅू तो मेरे शरीर में आग लग जाती है। बहुत गुस्सा आता है। गाँव के भी कुछ लोग बोली मुझे देखकर बोलते थे मै बहुत बर्दाश्त करता था। अभी भी कर रहा हूँ।
            रात को जब सोता हूँ तो जिस तरह उन लोगो ने मेरा कालर पकड़ कर लात घूसो से मारा था वह मेरे आँख के सामने घुमता रहता है। इस घटना के बाद से हमेशा चिन्ता बनी रहती हैं। उनकी दबंगई अभी भी कम नहीं हुई है वह लोग मौका तलाशते रहते है। यह ऐसे लोग है कि काम करने के बाद इनसे कोई भी मजदूरी न मागे अगर उसने कुछ कह दिया तब वह उसके खिलाफ होकर उस पर अत्याचार करेगे। मैने भी हिम्मत नहीं हारा है। अभी फिर मुकदमा कायम करने के लिए मामला दाखिल किया है जब साहब कह रहे है जब फाइल पढेगे तब कोई कार्यवाही होगी। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग नई दिल्ली लिखा पढ़ी की अभी वहा भी कोई सुनवाई नहीं हुई। अगर घटना के समय आप मिले गयी होती तो शायद मुझे इतना न भटकना पढ़ता।
            मैं यही चाहता हॅू कि मेरे साथ न्याय हो उन आरोपियों को उनके किया कि सजा मिले। भगवान मेरी विनती सुन ले नहीं तो लोगो का न्याय व भगवान दोनो पर से विश्वास उठ जायेगा। मुझे अभी भी उन लोगो से डर है लेकिन मै हिम्मत नहीं हारा हूँ।

साक्षात्कारकर्ता - फरहद शबा खानम्                            
संघर्षरत पीड़ित- जीत लाल