Friday, 17 April 2015

‘आंखों के सामने सब कुछ होता देख मन को बहुत दुःख हुआ’’

              मेरा नाम बनारसी लाल उम्र-60 वर्ष हैं। मेरे पिता स्व0 श्री बंगाली दास है। मेरी पत्नी फुलभारी देवी हैं। मेरे चार लड़के तीन लड़कियां हैं। विमल कुमार-32 वर्ष का है जो कि शादीशुदा है, और वह खराद का काम करता है। निर्मल चन्द जो कि मजदूरी करता है। मंजीत कुमार और संजीत हाईस्कूल पास है। दो लडकियां विवाहित है और छोटी लड़की कुमारी अनीता अविवाहित है। मैं राजगीर का काम करता हूँ।
मैं ग्राम-भीटा,पोस्ट-भीटा,थाना-घुरपुर, ब्लाक-जसरा, तहसील-बारा, जिला-इलाहाबाद का निवासी हूँ। 14 जुलाई, 2012 शनिवार की घटना से मेरी अधिक नुकसान हुआ। उस जमीन में मेरे लडके के नाम से पट्टा था। वहाँ कच्ची मिट्टी से 32 से 34 फीट का कमरा बनाकर टीन छाकर 8 फीट ऊँचाई का दरवाजा लगाकर उसमें सारा सामान गल्ला, सरिया, बालु, चिमटा, गद्दा, रजाई, सब कुछ रखा था। पत्थर बाधकर सरिया का पिलर देकर लिन्टर से बुनियाद बनाया था। सब कुछ उजाड़ दिया। यह कहकर चुप हो गये। क्या करुँ इस महँगाई में एक-एक सामान इकट्ठा कर रहा था कि घर बनवाऊॅगा लेकिन उस दिन उन लोगों ने मेरी मेहनत को खत्म कर दिया। जब बस्ती उजड़ रही थी तब मैं घटना स्थल पर नही था, औरत और मझला बेटी वहीं था। जब मुझे उसकी खबर मिली तो मैं दौड़ा भागा आया। देखा कि सारी जमीन पर पाल के लोग हसुआ लाठी के सहारे से सारा सामान ले जा रहे थे। मैं मजबूर खड़ा उनको ऐसा करते देख रहा था। क्या करता अगर कुछ कहते तो सामान का नुकसान होता और मुझे भी मार गिराते। बढ़ती उम्र में हाथ पाव तोड़वाकर बैठ जाता तो मेरे परिवार का क्या होता। उन्हें ऐसा करता देख मेरे मन को बहुत दुःख तो हो रहा था। लेकिन मैं बेवस था। उस वक्त मैं बहुत तफलीफ से गुजर रहा था। दो वक्त की रोटी जुटाना इस महगांई में मुश्किल हैं। सब कुछ ऐसा लग रहा था कि मेरा सब कुछ खत्म हो रहा हैं। हमें तमाशगीन बने देख रहा था। उन लोगों ने मिट्टी तक नही छोड़ा।
मैं वही था तभी पुलिस की गाड़ी आयी उनको यह कहते हुए मैंने सुना मैं दोबारा आऊ तो कोई भी निशान यहाँ न रहे जल्दी-जल्दी सब साफ करों। उस समय यह सुनकर मैं बहुत दुःखी हुआ, कि इनको हमारी रक्षा करने के बजाय वह उन्हीं का साथ दे रहे हैं। यही सब सुनकर मैं थाने नही गया। बस्ती की महिलायें जिन्हें चोट लगा था। कुछ आदमियों के साथ थाने गयी। वहा उनके साथ बुरा सलूख किया गया। दो लोगों को तो थाने में बन्द कर दिया गया। मैं थाने के बाहर ही कुछ दूर पर था। मैं अन्दर जाकर भी कुछ नही कर सकता था। क्योंकि पुलिस खुद उन आरोपियों का साथ दे रही थी। कुछ देर बीतने के बाद मेरा मन नहीं माना मैं भी थाने अपनी शिकायत लेकर गया तो वही हुआ जिसका अन्दाजा मुझे था। थाने में हमारी शिकायत नही सुनी गयी। पुलिस वालों ने उन लोगों से पैसा ले रखे थे। यह सब देख-देख कर मेरा मन बहुत दुःखी हो रहा था। हम गरीबों की तो कोई सुनवाई ही नही होती है। अब इस घटना से हम लोगों को पूरी तरह तोड़ दिया हैं। अब हमेशा डर बना रहता है। थाने में सुनवाई न होने पर हम लोगों ने तीन दिन के बाद कचहरी में केस दर्ज किया। वहाँ की तारीख लगती है। अभी तक वहाँ से भी न्याय नही मिला इसी चिन्ता में रात को नींद नही आती, मन अशान्त सा रहता है। मेरा तो बीत गया लेकिन बच्चों का फिक्र खाये जा रहा हैं। अगर यह लोग ऐसे ही दबंगई करते रहे तो हमारी चिन्ता और बढ़ जायेगी। थाने से भी कोई मदद मिलने की उम्मीद नही हैं।
उस घटना को याद करता हूँ तो बहुत गुस्सा आता है। मैं चाहता हूँ कि जिन लोगों ने हमारी जमीन पर कब्जा किया है। हमारा सब कुछ लूट ले गये, उनके खिलाफ सख्त से सख्त कार्यवाही हो और मुझे न्याय मिले। आप से मिलकर आपको अपनी बात बताकर मेरा मन हल्का हुआ हैं।

         साक्षात्कारकर्ता                                  संघर्षरत पीड़ित

         ( फरहत शबा खानम्)                             (बनारसी लाल)