Tuesday, 9 June 2015

यातना व संगठित हिंसा से संघर्षरत पीड़ित की स्व0 व्यथा-कथा

मेरा नाम कुसमा चौहान, उम्र-50 वर्ष है। मैं ग्राम-सायर, जिला-हमीरपुर (उ0प्र0) की निवासी हूँ।
            घटना लगभग 20 वर्ष पूर्व की है, जब मेरे पति को गाँव में ही किसी झगडे़ के कारण दबंग व्यक्ति ने गोली मार दी। जब मुझे पता चला तो मेरे होश उड़ गये, यह सोचकर की घर कैसे चलेगा। फिर भी हमने अपने आपको मानसिक रूप से सम्भाला और जीवन जीने के लिये तैयार हुई। हमारे परिवार में हमारे पति के 4 भाई थे। जिसमें से बड़े भाई मारे गये। उनके बेटे अभी भी हमारी मदद करते है।
            मै घर की मझली बहू हूँ, मेरी तीन लड़कियाँ है, जब मेरे पति को गोली लगी थी, उस समय तीनों लड़कियाँ छोटी थी और मेरी स्थिति बहुत नाजूक थी, इसके कारण मायके वालों ने हमें आर्थिक सहयोग दिया तथा हमने अपनी बेटियों को पढ़ाया-लिखाया। बेटी की शादी के समय मेरे पास कुछ नही था इसलिये मैने अपनी 40 बीघा जमीन, पड़ोस के  गाँव में यादव तथा पाल के पास बेच दी तथा बेटियों की शादी की। बेटियों की शादी करने के बाद हमने कुछ समय के लिए शान्ति का अनुभव किया और ऐसा लगा कि जैसे जिंदगी का सबसे बड़ा फर्ज निभा दिया है। अब हमारी जिंदगी में कुछ चैन व सूकून आया है, लेकिन हमारे छोटे देवर के लड़कों ने उस पाल को जमीन जोतने तथा बोने नही दिया, कहा-‘तुम जमीन दे दो, पैसे ले लो।’ जिस कारण पाल भी परेशान रहता है। वह थाने भी गया, लेकिन उसकी एक न सुनी गयी।
            देवर के लड़को ने इतना प्रताड़ित किया और हमारी तीन बीघा जमीन पर स्कूल खुलवा दिया। हमने उसे कभी हासिल करने की कोशिश भी नहीं की, क्योकि मैं अकेली थी और वह ज्यादा दबंग है। पाल ने कोशिश करके पुलिस के पास गया, लेकिन उसकी सुनवाई न होने पर उसने भी कोशिश करना छोड़ दिया।
            आज मैने आपके बीच अपनी बात रखी, हमें कुछ अच्छा लगा और बेहद खुशी महसूस हुई। मैं आज तक किसी अंजान व्यक्ति से इस तरह की बात नही कही हूँ, आपसे कहने पर हमें लगा कि जैसे हम आपको पूर्व से जानते हो।


साक्षात्कारकर्ता -ओंकारा व ममता चैरसिया
संघर्षरत पीड़िता -कुसमा चौहान           

संगठित हिंसा से संघर्शरत पीड़ित का स्व0 व्यथा-कथा

      मेरा नाम फुलचन्द्र द्विवेदी है। मैं ग्राम-हडहा, पोस्ट-गुइयाखुर्द, थाना-बरगड, तहसील-मउ, जिला-चित्रकुट (उ0प्र0) का रहने वाला हूँ।
            हमारी घटना तब की है जब मैं सिर्फ कमाकर अपनी जिन्दगी सुधारना चाहता था। मैं छठी तक पढाई बरगड के सरकारी स्कूल में किया। उसके बाद 17 से 18 साल तक की उम्र में हमने ट्रक में खलासी का काम करने लगा। घर से बाहर तीन से चार महीने तक रह जाता था। इसी तरह पुरे 5 साल तक हमने खलासी का काम किया। उस दौरान हमारा ड्राइवर गाड़ी पर, होटलो में तथा रास्तो में रूक-रूक कर बजारू लडकियों-औरतों के साथ यौन सम्बन्ध स्थापित करता था, उस समय हमें गाड़ी से उतार देता था। हमारी भी इच्छा होती थी, लेकिन बड़ो का सम्मान करता था। 5 साल बाद हम खुद ड्राइवर बन गये, और भी अपने ड्राइवर का देखी-देखा हम भी बजारू लडकियों-औरतों के साथ यौन सम्बन्ध स्थापित करने लगे, तब हमारी उम्र-23 से 25 के बीच में थी।
            इस बीच हमें इन्ही सब लड़कियों में एक लड़की पंसद आ गई, जिसका नाम रानी था। मैं उससे शादी करना चाहता था और मैने उससे कहा, वह मान गई। वह जौनपुर की थी, मैने उससे जाति नही पूछा था क्योकि वह बहुत ही सुन्दर थी। मैने उसे अपने घर ले आया और घर वालों से शादी की बात बताई, घर वाले तैयार हो गये, लेकिन शादी से दो दिन पहले ही वह हमारे घर आ गयी। जिस कारण हमारे घर वाले गुस्सा हो गये और शादी के लिये तैयार नही हुए, तब हमने कह दिया कि अब मैं शादी नही करूँगा।
            एक बार मैं भाभी की बच्ची को लेकर, सोनपुरी जिला चिकित्सालय, सोनपुर गया, जिसमे डाक्टर ने बच्ची के ईलाज के दौरान यह बता दिया कि इसे H.I.V है और एक के बाद एक करके भैया, भाभी और उनके बच्चों में भी H.I.V का लक्षण पाया गया।   हमे भी भगंदर था, बहुत दिन तक ईलाज चला, लेकिन ठीक नही हुए, तब डाक्टर ने हमें भी H.I.V बताया। मैं पहले इस मर्ज का नाम भी नही सुना था। डाक्टर ने जब इस बीमारी के बारे में हमे एक कोने में लाकर समझाया और यह भी कहा कि यह एक लाईलाज बीमारी है, इसका कोई ईलाज नही है, तब तो हमारे होश उड़ गये। मन के सारे सपने टूट गये, जिन्दगी से जुड़ी सारी उम्मीद चकना-चुर हो गया। मेरे दिमाग में यही घुम रहा था कि अब मेरी जिन्दगी का क्या होगा। अब हमारे पास कुछ भी नही बचा, इस तरह हमने अपने आप को और अपने करतूत को बहुत कोशा। डाक्टरों ने गाड़ी चलाना मना कर दिया, जिससे कमाने का जरिया चला गया। यह सब जानकर घर वाले बहुत बोले और माँ के बात से हमें बहुत दुःख हुआ। इस बात को लेकर मैं आज तक चिंतित रहता हूँ। हमें इससे भी अधिक दुःख तब हुआ जब हमें फरवरी 2010 में ग्राम प्रधान सत्य नारायण कोल के पास नरेगा में रोजगार माँगने गया, तब उसने हमें ग्रामिणों के बीच यह कह कर भगा दिया कि H.I.V के मरीज काम नही कर सकते है। हमने कहा पानी पिलाने या कोई भी काम में रख लिजिए, लेकिन उसने रखने से साफ इंकार कर दिया और अपने लोगो को रखा। फिर मैने कहा कि हमारा बी0पी0एल0 में नाम है, लेकिन आपने हमें न लाल कार्ड दिया और न ही कलोनी दिया। एक H.I.V पीड़ित को जो सुविधा मिलना चाहिए, उसे भी नही दिया। उसने हमारी बात को अनसुना कर दिया और कभी ध्यान नही दिया। इस घटना से मुझे बहुत दुःख हुआ और मेरा दिल टूट गया। मैं निरास होकर घर आ गया।
            अब हम कोई भी काम नही करते। कभी-कभी गाँव के पास-पड़ोस वालों को थोड़ा खेत लगभग 4 बीघा जोतता हूँ और बटैया कर लेता हूँ। इसके अलावा घर का काम भैया-भाभी के साथ मिलकर करता हूँ। कभी- कभी ऐसा होता है कि गाँव वाले हमसे कतराते है, हमारे साथ हमारे पड़ोसी अच्छा व्यवहार नही करते, ऐसा हमे महसूस होता है। इसलिये मैं कभी शादी-विवाह या किसी भी समारोह में भाग नही लेता हूँ। यही मेरी समस्या है।
            हम अपने उम्र के मित्रों के साथ इस बात की चर्चा करते है, लेकिन आपसे कहने पर कुछ अलग महसूस कर रहा हूँ। ऐसा लग रहा है, मानो आज हमने कुछ खो दिया है और हल्कापन महसूस कर रहा हूँ।

  साक्षात्कारकर्ता- ओंकारा विश्वकर्मा
  संघर्षरत पीड़ित- फूलचन्द्र द्विवेदी          



                        




‘‘लाचार पिता झेल रहा है, दबंगो की दबंगई।’’

      मेरा नाम छोटे लाल पाण्डेय है। मेरे पिता का नाम स्वर्गीय राम सुख पाण्डेय है। मेरा घर रूक्सा खुर्द, पोस्ट-बमनी पूर्वा, जिला-चित्रकुट (उ0प्र0) में है। मेरे परिवार में दादा, पत्नी एवं सात बच्चें हैं। जिसमें बड़ी लड़की, उम्र-22 वर्ष, दुसरी (मंजू ), उम्र-18 वर्ष, तीसरा बेटा, उम्र-14 वर्ष और अन्य छोटे-छोटे है। बड़ी बेटी की शादी हो गयी और सभी की शादी करनी है।
मेरे जीवन की सबसे बड़ी घटना 10 मार्च, 2011 के रात को हुई। उस रात मैं अपने बडे़ लड़के के साथ रात में खेत की सिंचाई करने के लिए गया था और घर पर मेरी पत्नी और सभी बच्चे थे। मेरे दादा जी घर के बरामदे में सो रहे थे और मेरी बेटी मंजू अपने माँ के साथ सोयी हुई थी। रात 12:00 बजे बदवा अपने दो साथियों के साथ घर के पिछे से घर में दाखिल हुआ और कमरे में जाकर मेरी पत्नी के मुँह को और हाथ-पैरो को रस्सी से बाँध दिया, फिर उसने पत्नी से तिजोरी की चाभी छिना और रूपये, गहने तथा मेरी बेटी को जबरदस्ती उठा ले गया और मेरी पत्नि को आँगन में फेंक दिया। रात में मेरी दुसरी बेटी की नींद जब खुली तो वह दंग रह गयी उसने अपनी माँ को उठाया और उसके रस्सी खोली और रात में ही मुझे बुलायी। मैं घर पहुँचा तो देखा की मेरी पत्नी चिल्ला रही थी। मैंने किसी तरह उसे समझाया और रात बितायी।
सुबह होने पर मैं थाने में तीन लोगों बदवा, बेनी और उसका मित्र दिनेश के खिलाफ एफ0आई0आर0 किया। पुलिस ने बदवा को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया, लेकिन उसके भाई और मित्र फरार रहे। मैन जब दरोगा से कहा तो दरोगा ने मेरा केस को फाड़ दिया और मुझसे अपने मन मुताबिक दुसरा रिपोर्ट लिखवाया।
मैं निराश होकर एस.पी साहब से मिलने गया वहा एस.पी साहब ने भी कोई कदम नहीं उठाया और मुझे थाने में ही भेजा और कहा दरोगा की शिकायत मत करो वही तुम्हारा कार्य करेगा। मैं वहा से भी बहुत निराश हो गया और घर वापस आ गया।
बदवा मेरा पड़ोसी है और उसके परिवार के लोग बहुत दबंग है। मुझे शक है कि उनके परिवार के ही व्यक्ति ने पहले मेरे घर में डाका डाला था, फिर बाद में मेरे पिता  की हत्या भी की थी।
इस घटना के बाद से मुझे घर के बाहर निकलने का मन ही नहीं करता। समाज से मेरा मान-सम्मान चला गया। अब मुझे बड़ी चिंता होती है, क्योंकि बदवा का भाई मुझे धमकाता रहता है कि अभी मैं तुम लोगों को बताउँगा। हमेशा मन डरा रहता है कि मेरी बेटी कैसी होगी। यह सोचकर मेरी पत्नी का कलेजा फटा जा रहा हैं। हमेशा रोती रहती है और घुट-घुट कर जी रही है। पड़ोसी हमें देखते ही ताना मारते हैं। मुझे अब अपने बच्चों की चिंता हो रही हैं। मैं उन्हे दुर पढ़ने भी नहीं भेज सकता क्योंकि मुझे हमेशा डर बना रहता है। इसी डर के साथ में हम जी रहे हैं। बच्चे भी डर के कारण कही आते-जाते नही। मुझे हमेशा डर बना रहता है कि बदवा मुझे मार न दे। इसी चिंता से मुझे रात में ठीक से नींद नही आती और मेरी पत्नी कभी-कभी रात में चिल्लाने लगती है। मेरे दादा भी चिंता से बिमार हो गये है। मेरा पूरा परिवार डर के साये में जी रहा है।
आपसे अपनी दुःखद घटना कहकर काफी हल्का महसूस हो रहा है। अब मुझे लगता है कि मेरी दबी हुई आवाज लोगों तक पहुँचेगी और मुझे न्याय मिलेगा। मैं जो डर के साये में जी रहा था अब वो काले बादल छँटेगें और मेरे परिवार को जीवन की सुरक्षा  और भय से मुक्ति मिलेगी।

साक्षात्कारकर्ता-छोटे लाल पाण्डेय         
संघर्षरत पिड़ित -रविशंकर व फूलमती व चन्द्रशेखर

           




लेखपाल व पुलिस दोनों ने मिलकर मेरी जिन्दगी बर्वाद कर दिया|

     मेरा नाम बाबू सिंह, उम्र-36 वर्ष है। मेरे पिता जी का नाम राम प्रसाद सिंह है। मैं ग्राम-अन्डौली,  पोस्ट-वैर्रावॅ, तहसील-बबेरू, जिला-बादा का रहने वाला हूँ।  मेरे परिवार में 17 लोग हैं, जिसमें माता-पिता, चार भाई, दो बहु,  पाच लड़के और चार लड़किया है।
            23 नवम्बर 2008 को हमारे गाँव में किसानो के लिए सुखा राहत का चेक  लेखपाल रामेश्वर गुप्ता लेकर आये, जिसका कम नुकसान हुआ था उसको अधिक पैसा का चेक दे रहे थे तथा जिनका अधिक नुकसान हुआ था उसे बहुत कम पैसे का चेक दे रहे थे। जब हमने लेखपाल से कहा कि आप ऐसा क्यों कर रहे है तब लेखपाल ने कहा हम ऐसा ही करेगें, क्या कर लोगे। उस समय मुझे बहुत गुस्सा आया और लेखपाल से मेरा झगडा हो गया। गाँव वालो ने मुझे पकड़ लिया और समझाने लगे हम उनकी बात मानकर अपने घर वापस आ गये। उसी रात लेखपाल ने मुझे मारने के लिए चार गुण्डो को हमारे घर पर भेजा, जिनके हाथ मे बंदुक थी और शराब के नशे मे थे। उस समय रात के 8:00 बज रहे थे। मै अपने घर मे बैठा था, गुण्डे मुझे माँ व बहन की गाली देने लगे और बोले तुम अगर लेखपाल के खिलाफ बोलोगे तो तुझे व तेरे परिवार को जान से मार डालेगे। उस समय मुझे बहुत डर लग रहा था, हमारी पत्नी व बच्चे डर के कारण रोने लगें। मै सोच रहा था अब क्या करू। मैने पुलिस प्रशासन को फोन पर सारी बाते बता दी। दरोगा व पुलिस वालो के आने से पहले गुण्डे हमारे घर से चले गये और गाँव के एक व्यक्ति के घर जाकर बैठ गये।
            दरोगा हमारे घर आने से पहले गुण्डो से मिले और उनकी बंदुके वहाँ छिपाकर दो गुण्डो के साथ हमारे घर पर आये और मुझसे बोले अगर लेखपाल व गुण्डों को फसाना चाहते हो तो पाच हजार रूपये मुझे दो। मै इनको जेल मे बंद कर चलान कर दुँगा। हमने पैसा देने से इंकार किया तो दरोगा मुझे व मेरे चचेरे भाई कमल सिंह को जबरजस्ती जीप में बैठाने लगा। उस समय रात के 12:00 बज रहे थे। हमारे परिवार के लोग रो-रोकर हम लोगो को छोड़ने के लिए दरोगा से दया की भींख मागने लगे, लेकिन दरोगा ने उनका एक भी नही सुनी और लोगो को बबेरू कोतवाली लाकर जेल में बंद कर दिया।
            दरोगा हमारे चचेरे भाई को बहुत मारा और हमें समझाने लगा कि लेखपाल को गाली क्यों दिये, उनकी शिकायत मत करो। उस बीच मैं सोच रहा था, इनसे न्याय की आशा नही की जा सकती है। हम लोग को उसने जेल मे बंद कर दिया।
            दरोगा रात में शराब के नशे मे आया, मुझसे कहने लगा कि तुम मेरी बात मान जाओ, यदि नही माने तो तुम्हारे हाथ-पाव तोड़कर इतने मुकदमा में फँसा दूंगा कि तुम्हारी जिंदगी खराब हो जायेगी। फिर भी बच गये तो साले इनकाउंटर करवा दूंगा। मेरी समझ मे कुछ नही आ रहा था कि क्या करू, कहा जाऊ, किसको अपनी दुःख सुनाऊ जो मेरी मदद करे। जेल की सफाई न होने से वहा मच्छर बहुत अधिक थे। हम दोनो भाई रात भर बैठकर रोते बिलखते रहे। हमें बहुत तेज प्यास लगी थी, प्यास से हम व्याकुल हो गये थे, हमे जेल में पीने के लिए पानी भी नही दिया गया।
            जब हम दरोगा की बात नही माने तो दरोगा ने दुसरे दिन हम लोगो को धारा 151 के तहत चलान कर दिया। हम लोग कचहरी आये वहा से हमारी जमानत मंजूर हुई। हमें लगा मैं अपराधी भी नही हूँ, इसके बाद भी मुझे जेल में बंद कर दिया गया। मुझे दरोगा व लेखपाल पर बहुत गुस्सा आ रहा था, लेकिन मैं मजबूर था, हम लोग घर चले आये। हमने अपने भाई से कहा था घटना के बारे में जो पुलिस धमकी दी है किसी से मत बताना। जब चाचा ने दबाव देकर घटना के बारे मे पुछा तो मेरा भाई चाचा से सारी बाते बता दिया। जिससे चाचा इस सदमें को नही झेल पाये और 24-11-2008 को उनकी मृत्यु हो गयी। पूरे परिवार के लोग रोने-चिल्लाने लगे। अगर तुम लेखपाल से झगड़ा नही किये होते तो आज तुम्हारे चाचा की मृत्यु नही होती, तुम्हारी वजह से इनकी जान गयी है। उस समय मुझे सबसे अधिक दुःख हुआ। मन तो कर रहा था कि दरोगा और लेखपाल को जान से मारकर आत्म-हत्या कर लूँ। मैं अपने किस्मत पर रोने लगा, चार दिन तक परिवार के लोग मुझसे बात नही किये।
            इतना सब कुछ होने के बाद भी लेखपाल हमारे गाँव में काम कर रहा है और गाँव के चार दलित को लालच देकर कहा-‘‘तुम लोग बाबा सिंह की जमीन पर कब्जा कर लो, मैं तुम लोगों को वह जमीन पट्टा करा दुंगा।’’ लेखपाल और दरोगा मेरे ऊपर हरिजन एक्ट का झुठा मुकदमा दायर कर दिया, जिससे मैं बहुत परेशान हो गया हूँ।

            आज तक मैने उन लोगो को कभी गाली भी नही दिया, फिर भी उन लोगो ने हरिजन एक्ट लगा दिया। इससे बचने के लिए मैं अपनी टेन्ट व लाइट की दुकान बेचकर पचास हजार रूपये देकर अपनी जान बचाई। मेरी आर्थिक स्थिती दिन पर दिन खराब होती गयी। मेरे परिवार के लोग भी बहुत चितिंत रहते है। मेरी दशा देख मेरी पत्नी व बच्चे रात दिन रोते बिलखते थे। उन्हे रोता देख मुझे बहुत दुःख होता था। परिवार के लोग तो रा-रोकर अपना-अपना दुःख दूर कर लेते है। मैं तो रोकर भी दुःख दूर नही कर सकता।
            मुकदमा अभी चल रहा है, जब मुझे पता चला कि लेखपाल हमारे जमीन को उन चार लोगो में आवंटित कर देगा तो मैं अपनी जमीन को बचाने के लिये दिवानी कोर्ट मे मुकदमा कर दिया। जिसमें दो लोगों ने कोर्ट मे हलफनामा द्वारा बयान दिया कि लेखपाल ने हमे धोखे मे डालकर यह जमीन देना चाहता है। वास्तव मै यह जमीन बाबा सिंह की है। हमे इस जमीन से कोई मतलब नही है। मुकदमा अभी भी चल रहा है। मै हमेशा चितिंत रहता हूँ। मुझे नींद नही आती, मन हमेशा बेचैन रहता है। कभी-कभी रात में सपना आता है तो उठकर रोने लगता हूँ। मेरे सिर मे हमेशा दर्द  होता है। काम भी करने की इच्छा नही करती है। मेरी दुकान भी बंद हो गयी है, हर तारीख पर 300/- रूपये लगता है। इतना पैसा कहा से आयेगा, यही चिंता बराबर  बनी रहती है। खाना भी अच्छा नही लगता है, सोचता हूँ, अगर मुझे कुछ हो गया तो मेरे परिवार की देखभाल कौन करेगा।
            मै इतने तनाव में हो गया हूँ कि मेरा शरीर आज भी अस्वस्थ रहता है। जब कभी भी लेखपाल व पुलिस को देखता हूँ, तो मुझे बहुत गुस्सा आता है। ऐसी घटना और किसी के साथ न करे। मैं यही चाहता हूँ कि लेखपाल व पुलिस के खिलाफ कानुनी कार्यवाही हो और इन्हें कड़ी से कड़ी सजा मिले ताकि न्याय हो। मै अपनी कहानी सुनकर बहुत हल्कापन महसुस कर रहा हूँ।

 साक्षात्कारकर्ता - दिनेश कुमार अनल व राम नरेश
 संघर्षरत पीड़ित -बाबू सिंह             

Monday, 8 June 2015

‘‘रेशम विभाग ने जलाया आशियाना’’

               मेरा नाम आशा देवी, उम्र-38 वर्ष है। मेरे पति का नाम नान्हू मुसहर है। मैं अनपढ़ महिला हूँ। मेरे दो लड़के और दो लड़कियां है। बड़ी लड़की का नाम रीना है, दुसरी लड़की का नाम ज्योती है, जो अभी एक वर्ष की है, तीसरा लड़का सुविल तथा चौथा लड़का गोविन्द है। मेरी बड़ी लड़की पढ़ी नही है, लेकिन दोनों लड़के अभी पढ़ रहे है। मैं अपने पति के साथ ईंट भट्ठे पर मजदूरी करती हूँ। इसके अलावा सीजन खत्म होने पर गाँव में रोपनी का काम कर लेती हूँ, जिससे मेरे परिवार का खर्च किसी प्रकार चल जाता है। मैं ग्राम-बेलवानी, पोस्ट-मथौला, थाना-बलूबा, तहसील-सकलडीहा, ब्लाक-चहनियाँ, जिला-चन्दौली की रहने वाली हूँ।
            आज से कुछ दिन पहले अगहन का महिना था, हमारे यहाँ पन्ना मेठ आये और चमरहाँ के रमेश सिंह के ईंट-भट्ठे पर काम करने को बोले। उन्होंने बताया कि एक हजार ईंट पथाई पर 350/- रुपये मजदूरी मिलती रहेगी। पन्ना की बाते सुनकर मैं और मेरे पति रमेश सिंह के भट्ठे पर काम करने चल दिये और रात दिन मेहनत कर दिनभर में सोलह सत्तरह सौ ईंटा पाथ लेते थे। पहले तो सब कुछ ठीक था, लेकिन दो महिना बाद भट्ठा मालिक से जब खुराकी माँगते तो भट्ठा मालिक कहता तुम लोगो का ठीका लिया हूँ। बहुत कहने पर गोबर की ऊपरी देते थे, वो भी गिला, जो बिना लड़की के जलती ही नही थी। मैं परेशान हो जाती थी। कभी-कभी बिना ईधन के भूखे ही सोना पड़ता था। इसी तरह खोराकी पाँच सौ हफ्ता देते थे, जिसमें मैं, पति और चार बच्चों का खर्चा चलाना पड़ता था, उसी में बच्चे की तबियत खराब हो जाती तो जब माँगते तो मालिक बहाने करता कहता पाँच सौ खोराकी देता हूँ, वह पूरा खा जाते हो तुम लोग। किसी तरह कर्ज लेकर दवा दर्पण करते थे। इसी तरह समय बितता गया, मालिक कहता दशहरा पर होगा, तो कही होली पर, तो कही बसंत पर, सब बीत गया लेकिन उसने हमारा हिसाब नही किया। अभी हम लोगों की मजदूरी वहाँ पर बकाया थी कि एक दिन भट्ठा मालिक हम लोग जिससे उषा, सुदर्शन, नान्हू, मुन्ना, सारनाथ, जागिन्दर, रामअवतार, बनिज, आशा, पुष्पा, मीरा पर छप्पन हजार (56,000/-) का कर्ज बताने लगे। उनके इस झूठे कर्ज के आरोप के चलते मेरा मन बैठ गया, मैं सोचने लगी कि अभी तो मेरी मजदूरी ही मुझे नही मिली, तब तक इतना कर्ज मुझ पर कहाँ से आ गया। मैं तो दादनी भी एक पैसा नही लिया था और चिन्ता के मारे मैने खाना भी नही बनाया, सोची की अब क्या होगा। तभी मेरे पति के पेट में फोड़ा उभरने लगा, उन्होनें मुझे उसके बारे में बताया, धीरे-धीरे उनका फोड़ा बढ़ने लगा, वह काफी परेशान रहने लगे। इस वजह से उनके इस प्रकार बिमार होने से मेरी परेशानी बढ़ने लगी, क्योकि उनसे कोई काम नही किया जाता था, मिट्टा नही भीगा पाते थे, जिससे तीन-चार दिन तक कोई काम नही हुआ। भट्ठा मालिक आकर हमेशा गुस्साता और कहता की बैठकर खाओगें। मैं उनकी बाते सुनकर रोती, कहती की आज मेरी स्थिति का जिम्मेदार कौन है, अपने पति की हालत को देखकर मैं घबराने लगी और मुझसे जब रहा नही गया तो मैं भट्ठा मालिक से पैसा माँगने गयी। मालिक मेरे पति की तबियत बहुत खराब है, उनके पेट में फोड़ा हो गया है, यदि कुछ पैसा दे देते तो मैं उनका इलाज करवा देती। 
          भट्ठा मालिक मुझे डाँटकर भगा दिये, बोले की तुम लोगों को चरबी चढ़ गयी है, बैठकर बिमारी का बहाना कर रही हो और आयी हो पैसा माँगने, पहले काम करो तब तुम लोगो को पैसा मिलेगा। मैं रोते हुए दुःखी मन से निराश होकर वहाँ से चली आयी और पूरी रात अपने पति के बारे में सोचती रही।
            सुबह हिम्मत करके मैं और बेटी रीना मिट्टी भिगाये और ईंट पाथने लगे। पुरे दिन मेहनत करते, इसी लालच में की पैसा देगें तो ईलाज होगा, लेकिन उन्हें मुझ पर तरस नही आयी। चार दिन काम करने के बाद पैसा माँगी तो उनका जवाब पहले ही जैसा था। अब मेरा मन निराश हो गया और दुसरे दिन मैं भट्ठा पर से पति और बच्चो के साथ उसी भट्ठे पर से अपनी देवरानी से कुछ पैसा उधारी लिया और घर चली आयी। घर आने पर मैने अपने मायके और रिश्तेदारी से कर्ज लेकर प्राइवेट दवाखाने से उनका ईलाज करायी। दो महिने तक उनका ईलाज चला। उनका फोड़ा दवा के बल पर बैठ गया। भट्ठा मालिक धमकी देता था, बोलता की तुम लोग इतना पैसा लेकर खाये हो, मेरा पैसा नही भरोगें तो जान से मारवा दूँगा, लेकिन मैं भट्ठे पर नही गयी। अगल-बगल मजदूरी करती थी। पति भी मोटा काम कर लेते थे। इसी से किसी प्रकार पेट का खर्च चल रहा था। तभी परसों सूचना मिली की भट्ठा मालिक अन्य लोगों को भी परेशान कर रहा है। भट्ठा मालिक और लोगों को वहाँ से निकलने नही दे रहा है, तो सुनकर बहुत दुःख हुआ। उसमें से सुदर्शन ने बताया की भट्ठा मालिक के इस व्यवहार से सभी परेशान है, तब मेरे पति ने मानवाधिकार आफिस के बारे में बताये। वहाँ से कुछ लोग आफिस जाकर सूचना दिये, तब जाकर बंधको को वहाँ से मुक्त किया गया, वहाँ से मुक्त होने के बाद जब लोग बाहर आये तो उन लोगों के साथ मैं भी गयी, मेरे पति भी साथ में थे और हम सभी एस0डी0एम0 साहब के बंगला पर गये, लेकिन वह नही मिले तब हम लोग भोजूवीर गये और अपने बारे में पुरी जानकारी दिये, लेकिन एस0डी0एम0 साहब आकर मुझे और मेरे पति को गुस्साने लगे बोले तुम लोगो को मारकर जेल में भेजवा दूँगा। साहब की बाते सुनकर मैं घबरा गयी। मेरी आँखो से आँसू छलक पड़ा, लगा कि मेेरे पति को ये लोग जेल भेज देगें, लेेकिन कुछ देर बाद सब ठीक हुआ। बाद में हम लोग आफिस में आये। उस समय रात के 9:00 बज गया था। उस दिन मैं पूरी रात जागती रही, मुझे नींद नही आयी, अभी भी मुझे डर है कि भट्ठा मालिक हम लोगों को मारे-पिटे न। उसके लगाये गये झुठे कर्ज के आरोप से हम लोगों को मुक्ति मिल जाये और हमारी मजदूरी मिल जाये। आप लोगों से अपनी बाते बताकर मन को सूकून मिला है।

साक्षात्कारकर्ता- मीना कुमारी पटेल
संघर्षरत पीड़िता-आशा देवी                  






दबंग व्यक्ति द्वारा गरीब मुसहर को बनया गया बन्धक!

        हमारे भारत देष में गरीब मजदूरो के लिए मानो जगह ही नहीं है। उन्हे मारना-पीटना उनका शोषण करना दबंगो का पेशा बन गया। वे लोग कानून को कढपुतली समझते है, और गरीबो के जीवन से खिलवाड करते हुए उन्हें बन्धक बनाने में शौक का अनुभव करते है। ऐसे ही गरीब मुसहर की स्व0 व्यथा कथा उसकी जुबानी से सुने।
मेरा नाम वोडर मुसहर पुत्र कालीचरन मुसहर उम्र 40 वर्ष, मेरी पत्नी का नाम अतवारी देवी उम्र 38 वर्ष है। मेरे पास भगवान का दिया हुआ 2 लड़का, 2 लड़की है। जिनका नाम कैलाश, विनोद, आरती, निशा, उम्र 16,14,12,10, वर्ष के है। मै ग्राम-श्रीरामपुर, पोस्ट-मिर्जामुराद, थाना-मिर्जामुराद, जिला-वाराणसी का मूल निवासी हूँ। मै गरीब असहाय जाति का मुसहर हॅू। मै व मेरी पत्नी ईट पथाई का काम करते है। मै पप्पू मेठ के माध्यम से ईट पी0एक्स0एन मार्का जो ग्राम हमरीपुर, पोस्ट-जंसा, थाना-जंसा, जिला-वाराणसी में स्थिति हैं। मै पप्पू मेठ के साथ ईट भट्ठे पर चले गये वहा जाने पर मै व मेरी पत्नी आपस में राय किये की इस भट्ठे पर कितना रेट है तो भट्ठा मालिक व मुन्शी जिनका नाम प्रभुनारायन शर्मा, मन्शी सूर्यवली उर्फ करिया है। इन सभी द्वारा बताया गया कि आप लोग को 1000 ईट पथाई करने पर 500/रुपये दिया जायेगा। तब मै व मेरी पत्नी खुशी से ईट पथाई काम करने के लिए राजी हो गये, तो भट्ठे मालिक व मुन्शी द्वारा 5000/हजार रुपये दादनी के रुप में दिये । तो मै व मेरी पत्नी ईट पथाई करने लगे प्रतिदिन 1200 से 1300 सौ ईट पथाई का करने लगे। एक सप्ताह आने पर भट्ठा मालिक द्वारा हमें 300 से 400/रुपये के रेट खोराकी मिलता था। लेकिन उतने में हम लोगो का पेट नहीं भर पाता था। भट्ठा मालिक को मै बोला की मालिक हमे खोराकी थोडा सा बड़ाकर दीजिये गा। इतने में भट्ठा मालिक हमलोगो को भद्दी-भद्दी गाली देने लगे और वहाँ से भगा दिया। उस समय हमे बहुत दुःख हुआ मगर मै क्या करता।
इस विराने जगह में आकर फस गया था। हमारे पास चार बच्चे थे। मै 300-400/सौ रुपये में खोराकी नहीं चल पाता था। तो मै बहुत चिन्तित होकर रहता था। मगर हमें बहुत दुःख होता था। भट्ठा मालिक व मुन्शी के ऊपर बहुत गुस्सा आता था। मगर मै क्या करता कैसे लड़ता तब पर भी भट्ठा मालिक व मुन्शी ये दोनो सप्ताह में जब खोराकी देते थे उस समय हमे भीगा लकड़ी देते थे। हम लोग उस लड़की को जताले थे मगर सही तरीके से जल नहीं पाती थी। हमलोग खाना बनाने में बहुत परेशानी होती थी। हमारे बच्चे खाना कच्चे पक्के ही खाते थे।
 यह देखकर हमें बहुत तकलीफ होती थी। मै अपनी गरीबी पर एवं कमजोरी जाति पर कमजोर असहाय थे। मै व मेरी पत्नी जो ईट पथाई करते थे उसका हिसाब जोड़-घटाना सही तरीके से नही होता था। हमेशा हमारे ईट को मुन्शी कम बताते थे। खोराकी सप्ताह के दिन बहुत कम देते थे। राशन के अभाव में भूखे सो जाते थें मगर हम लोग फाका मारकर जी रहे थे। हम लोग बिमार होने पर भी मालिक व मन्शी के डर व भय के कारण पथाई बन्द नहीं करते थे, और दवा के लिये डर के मारे पैसा भी नहीं माँगते थे, सप्ताह में जब खोराकी के लिए पैसा मिलता था। तब मै व मेरी पत्नी जब बाजार जाते थे मुन्शी द्वारा पीछा किया जाता था और निगरानी करता था।
            अब मै चाहता हूँ कि मालिक व मुन्शी के ऊपर कानूनी कार्यवाही हो और मै व मेरी पत्नी को न्याय मिले ऐसे गिद्धो व शैतानो को ऐसा सबक सिखाया जाय जो कि किसी बहन बेटी एव भाई इन सभी के ऊपर अन्याय न करे। यहाँ से सभी बन्धुआ पथेरा को मुक्ता कराया जाये।


साक्षात्कारकर्ता  . दिनेश कुमार अनल                                       
संघर्षरत पीड़ित .वोडर मुसहर