Saturday, 6 June 2015

‘‘हम गरीब को दबंगो और पुलिस ने दिया धमकी’’

मेरा नाम परमेश्वर उम्र 27 वर्ष पिता राजाराम जाति अहिर हमारे दो लड़की एक लड़का है मजदूरी कर अपने परिवार का पालन- पोषण करता हूँ।
घटना दिनांक 06.07.2003 का समय 5:00 बज रहा था| रोज कि तरह मजदूरी कर घर आ रहा था उसी समय रास्ते में ही टेम्पो गाड़ी ने हमें धक्का मार दिया जिससे एक पैर बुरी तरह से खराब हो गया, हम बेहाश हो गये उसके बाद हमे लोग जिला अस्पताल ले गये, उसने टेम्पो से धक्का मारकर भाग गया लेकिन गाँव वालो ने उसे पक लिया, उसका नाम सुरेन्द्र कुश्वाहा पुत्र खरपत्तु कुशवाहा निवासी भसी, थाना- धोरावल, जिला -सोनभद्र गाड़ी नं0 यू एम जेड 8794 है। उसके बाद गाड़ी छोड़कर भाग गया किसी तरह हम गरीब जिला अस्पताल ले गये लेकिन वहा से भी जाबाव हो गया कि मामला सिरियस है उसे तत्काल वाराणसी ले जाइये तब हमारी माँ और भाभी दोनो लोग अपना गहना गिरवी रख कर मुझे वाराणसी ले गये, जहाँ पर दवा चल रहा था, लेकिन मेडिकल लेकर हमारे भैया थाने ले जाकर एफ.आई.आर दर्ज कराने के लिये कोतवाली रावटर्सगंज पुलिस थाना गये  लेकिन वालो पुलिस ने एफ. आई. आर. दर्ज नहीं कर रहे थे उल्टा मेरे भाई को गाली भी दे रहे थे उसके बाद कोई नेता आया तो वह एफ. आई. आर दर्ज किये और अपनी गाड़ी से बयान लेने के लिये हास्पिटल गये लेकिन वहा पर पुलिस वाले गये बोले की मर जाना अच्छा है नही तो बड़ी परेसानी ही होगा यह पैर कटवाना पडेगा।
       लेकिन नहीं कटा हम गरीब अपना किसी तरह से अपनी रहने वाला घर बेच कर जान बचाया गया उसके बाद मामला कोर्ट में चल रहा है जज द्वारा मुआवजा 1 वर्ष पहले ही दो गया 265665 दो लाख पैसठ हजार छःसौ पैसठ लेकिन अभी तक नहीं मिला हम गरीब दर-दर कि ठोकरे खा रहे है हम अब मजदूरी करने के लायक भी नहीं है। आज 10 वर्ष से उपर हो गया मेरे घर भीख मागने कि नौबत हो गयी है हम गरीब को न्याय नही मिल रहा है।
हमें विपक्षा द्वारा बार-बार धमकी मिलती है कि सुलह कर लो नही तो जान से मार देगे हम गरीब लोग दर-दर की ठोकरे खा रहे है।
अपनी बात बताने में बड़ी कष्ट हुआ लेकिन बताने के बाद बहुत अच्छा लग रहा है कि हमने अपने हक की लड़ाई लडे़गे न्याय मिलेगा हमें विश्वाष है हम गरीब आदिवासी को न्याय मिले।
साक्षात्कारकर्ता   - पिन्टू गुप्ता 
संघर्षरत पीड़ित- परमेश्वर

                              

‘‘मेरी बेटी को उठा ले गये पुलिस मामले को कमजोर बना दिया’’

      पिछले एक वर्ष में भारत में रेफ बलात्कार व छेड़-छाड़ जैसी बला का उम्र बढ़ गया है। ये इतने शाक्तिशाली हो गये है कि कानून इनके मुहॅ की चाभी बन गई है। ऐसे ही तत्व ने एक गरीब की बेटी को बनाया अपनी हवश का शिकार आइये सुनते है। एक पीड़ित की कहानी उसी की जुवानी से।
            मेरा नाम मोहन पटेल उम्र 65 वर्ष ग्राम-केकराही, पोस्ट-केकराही, थाना-कर्मा, तहसील-राबर्ट्सगंज, जिला-सोनभद्र का मूल निवासी हूँ।
            मेरी घटना यह है कि यह घटना 09 जून, 2013 की है। मेरी बेटी सुखीया कुमारी अपने दीदी हमारी दुसरी बेटी के घर रहती थी। शाम के समय मेरी बेटी सुखिया समय 7:00 बज रहा था। शौचालय जा रही थी। खेत में अचानक एक सफेद रंग का बेलोरो मेरी बेटी के सामने ला कर खड़ा कर दिया फिर बेलोरो पाच लोग निकले जिनका नाम पिन्टू, संजय, गुलाब और निर्मला राजकुमार ये लोग बेलोरो से निकले और मेरी बेटी को पकड़ कर जबरजस्ती ले गए, जहा से वो मेरी बेटी को ले गये उस जगह का नाम केलहट है।
 जब मेरी बेटी को वो लोग ले गए हम सुने तो हम लोग घबरा गये और हर जगह खोजने लगे लेकिन वह नहीं मिली फिर हम थाने पर जाकर आवेदन देने गऐ तो थाने वाला मेरा आवेदन नहीं लिये और हमको डाट कर भगा दिये कोई कार्यवाही नहीं किया गया हमलोगा पागल जैसे हो गए थे। कुछ समझ में नहीं आ रहा था। हम क्या करे और फिर एक दिन दिनांक 14 जून, 2013 को मेरा बेटी शाम को मेरे घर आ गयी बेटी को देखकर हमलोग और ज्यादा परेशान हो गए| मेरी बेटी कि हालत हमसे देखी नहीं गई क्यों कि वे बहुत परेशान हो गए थी, हमलोग उससे पूछे कि तुमको कौन ले गया था और कहा ले गया था। तो उसने कुछ नहीं बताई, जो लोग मेरी बेटी को ले गये थे। उसे खुद पता नही था। फिर वो बोली कि वो लोग मेरे साथ बलात्कार करने की कोशिश किया| हम भागना चाहे लेकिन नही भाग पाये| हमको एक कमरे में बन्द कर के चले गए| जब मेरा तबीयत खराब हो गयी तो वे लोग हमको दवा लाके भी दिये। मेरी बेटी की पूरी बात सुनकर हमारे पैरो तले से जमीन खिसक गया। आँखो के आगे अंधेरा छा गया कि अब क्या होगा हम क्या करें अब हम कैसे समाज में मूहॅ दिखाएगें मेरा इज्जत खत्म हो चुका था। ये कैसा अनर्थ हो गया सिना दर्द से फट गया मेरी बेटी का जीवन बर्बाद हो चुका था। मेरी बेटी बहुत रोए जा रही थी कि अब क्या होगा मेरा हाथ कौन थामेगा एक लड़की के लिऐ उसका इज्जत ही सब कुछ होता है। भयभीत हो गया और मेरी बेटी यह भी बोली कि वो लोग हमको केलहट बाजार में छोड कर चले गये थे और बोले कि अगर यह बात तुम किसी को भी बताई तो हम तुम्हारे पूरे परिवार को तुम्हारे सामने जान से मार देगें और फिर तुमको भी मार देगे, हम अपनी बेटी का पूरा बात सुनकर हम फिर थाना गए आवेदन देने और कहे कि जो लड़की पाच दिन से गायब थी वे मिल गई है। थाने वाला मेरा आवेदन ले लिया और फिर बिन्दु नामक को पकड़कर दो दिन थाने में रखा दो दिन बाद धारा 151 लगाकर चलान कर दिया लेकिन व जमानत कर कर घर आ गया और फिर हमारे घर आकर गाली-गलौज करने लगा और धमकी भी दिया कि अगर आगे कुछ किये तो तुम्हारा घर सहित उड़ा देगें उसकी यह बात सुनकर और पुलिस की लापरवाही देख कर हमको बहुत गुस्सा आया हम एस0पी0 के पास गए पर वहाँ हमको अन्दर जाने नहीं दिया हमको गेट पर से ही भगा दिया गया| मेरे परिवार का हालत इतना खराब हो गया है कि दर-दर की ठोकरे खा रहे। लेकिन अभी तक कोई सुनवाई नहीं हुआ मेरी मासूम बेटी का क्या दोष था। उन बदमाशो ने मेरी बेटी के साथ जो किया इससे वह बहुत चिन्ता में रहता हूँ कि कही मेरी बेटी को कुछ हो ना जाए।
            मेरी बेटी और मेरा परिवार यह चाहता है कि उन सबको कड़ी से कड़ी सजा मिले जिससे फिर किसी का जीवन वो लोग बर्बाद न करे और उसे न्यास मिले इस घटना में मेरी बेटी बीमार रहने लगी है बहुत डर गई है।
हम अपनी बात को बताकर हल्कापन महसूस कर रहा हूँ, हमें उम्मीद है कि हमको न्यास जरूर मिले गा।
साक्षात्कारकर्ता  - पिन्दू गुप्ता                    
संघर्षरत पीड़ित- मोहन पटेल


                                          

Wednesday, 3 June 2015

जिसको अपना समझा वही घर से वेघर कर दिया

मेरा नाम बसन्ती देवी पत्नी बालेश्वर दास ग्राम-खेसनरो, पोस्ट-पिहरा कहुआर, थाना-गाँव, जिला-गिरिडिह की मूल निवासी हूँ। वर्तमान में ग्राम-गरहा, पोस्ट-मसनोडीह, थाना-डोमचाच, जिला-कोडरमा में रह रही हूँ।
            मेरी घटना यह है कि मेरी शादी मेरे पति बालेश्चर दास से हुई तो मेरे पति और मेरे ससुराल ने मेरे माईके वालो से कहा की मेरा पत्नी मर गई मुझे एक लडकी है। तो मेरा माईक वाले सोचे की चलो एक लड़की है। तो क्या होगा शादी कर के अपने ससुराल चली जाएगी और जब मेरे माईके वाले लड़का देखने गए तो घर में जीस लडकी के बारे में वो बताए थे वो ही लड़की थी और कोई बच्चा नहीं था यह सब देखकर मेरी शादी मेरे माईके वाले वाले वही कर दिये और जब मेरी शादी हुई हम अपने ससुराल गए तो वहा सबकुछ देखकर दंग रह गए हम देखे की वहा पर तीन बच्चा था दो लड़का और एक लड़की हम जब अपने पति से पूछे तो वो बोले की यह तीनो बच्चा मेरा है तो हम बोले कि आप तो बोले थे कि मुझे एक लड़की है। तो मेरा पति बोले कि हम झूठ बोले थे क्यो कि अगर हम झूठ नहीं बोलते तो मेरी शादी तुमसे नहीं होती हम यह सब कुछ देखकर और अपने पति का बात सुनकर बहुत रोए और खाना भी नहीं खाए। 
       फिर हम सोचे कि मेरी किस्मत में शायद यही लिखा था यह सोच कर हम अपने पति व उन तीनो बच्चो का अपने बच्चो की तरह ख्याल रखने लगे इसी तरह समय बीतता गया, और मुझे भी तीन लड़की और दो लड़का हुआ हम अपना पूरा परिवार को अच्छी तरह सम्भाले मेरे दोनो सौतले बेटे बडे हो गए और बेटी भी हम उन तीनो का शादी करके घर वसा दिये मेरी भी दो लड़की का शादी हम कर दिये।  इसी तरह हम अपने जीवन का 20 वर्ष अपने घर परिवार व गृहस्थी को सम्भालने में लगा दिये मेरा दोनो सौतेले बेटो का घर संजय और सुनील का घर बस गया। तो मेरे पति हमको मारने-पिटने लगे व गन्दी-गन्दी गाली देते और तरह-तरह के तने देने लगे जब हम अपनी दूसरी बेटी निर्मला का विवाह तय किये तो अपने बेटो व पति को शादी का खर्चा मागे तो मेरे पति हमको शराब पीकर मारने-पीटने लगे और कहे कि मेरे पास पैसा नहीं है। 
        हम नहीं देगे तो हम यह सब सुनकर बहुत हम रोए क्यो कि उस घर में हम जब से गए थे। खुद कमाकर अपना व अपने बच्चों का पालन-पोषण किये, मेरे पति बोले की तुम मेरा घर छोड़कर चली जाओ हम जब यह सुने तो मेरे होश उड गए कि जब घर सम्भालना था तब कुछ नहीं बोले और जब सबकुछ ठीक हो गया तो मुझे घर से बेदखल कर रहे है। हम अपने पति से तंग आकर अपने दोनो सौतेल बेटो के पास गए जिन्हे मेरे अपने सीने से लगाकर पाला था। सोचे शादय वो कुछ कहेगे हम उनको सारी बात बता दियें लेकिन वो दोनो कुछ नहीं बोले क्या की यह सब करामत उन्हीं लोग का था| मै तंग आकर हम अपने माईके चहले आए और कुछ दिन रह कर हम अपने ससुराल आए और अपने पति से बोले की जमीन व सम्पत्ती बाट लिजिए तो बहुत कहने पर मेरे पति तैयार हुए फिर पंचायत का आदमी आयां और पंचायत बैठाकर सम्पत्ती को चार भाग में बाटा गया दो भाग सौतेले बेटो के नाम से दो भाग मेरा बेटो के नाम से और फिर मै अपने पति को मिली कालोनी में रहने लगे लेकिन मेरे पति हमको चैन से नही रहने देते। कभी शराब पी कर आते घर पेशाब कर देते घर में बना खाना बाहर ले जाकर फेक देते घर का सारा बर्तन चपटा कर देते अगर हम कह बोलते तो मुझे गाली देते मारते हम सब कुछ सह कर भी वही रहे लेकिन एक दिन मेरे पति हमको बहुत मारे और बोले तुम यह से चली जाओं नहीं जो हम तुम्हें जान से मार देगे हम वह बात सुनकर बहुत डर गए और सोचे की आखिर मैने किसी का क्या बिगाडा है जो मुझे ऐसा सजा मिल रही है। हम तंग आ कर अपने माईके डोमचाच गरहा आ गए हम वहा से इस लिए चले आए कि मेरा तीन छोटे-छोटे बच्चों है अगर हमको कुछ हो गया तो उनका क्या होगा उनको कौन पालेगा यही सोच कर हम वहा से अपने तीनो बच्चों को लेकर चले आए। हम यह कुछ दिन रह कर हम फिर हिम्मत कर के ससुराल गये ।हम वहा जब गये तो देखे की मेरे पति घर का सारा सामान बेच दिये घर में कुछ नहीं था। हमको उस दिन बहुत रोना औ रहा था मेरा दिमाक नही काम कर रहा था। कि अब हम क्या करे कैसे रहेगे क्यों घर में जो भी कुछ था हम बहुत मेहनत मजदूरी कर के लाये थें। फिर भी हम कुछ नहीं ओले और वहा ये चुपचाप चले आए हम अभी एक साल से माईके में है। मेरे पति अभी तक हमको लेने नहीं आये और लगातार फोन करके धमकी देते थे और फोन पर गन्दी-गन्दी गाली देते है। 
       उनकी गाली सुनकर और उनकी धमकी सुनकर नातो हमको भूख लगा और नाही प्यास। रात को नींद भी नहीं आता बहुत बेचैनी सा लगता है। रात-दिन अब यही चिन्ता सताती है। कि अब क्या होगा मेरा सौतेले बेटा भी हमको फोन करके कहता है एक लाख अस्सी हजार दो नही तो हमको जहा पर रह रही हो वही आकर जान से मार देगे यह सब सुनकर मेरा दिल तड़प जाता है कि जिसको कभी भी सौतेला बेटा नहीं समझा हमेशा अपना बेटा समझकर पाला उनका घर वसाया वही बेटा हमको जान से मारने की धमकी देता है हम अब क्या करे हमको कुछ समझ में नहीं आता आप सबको अपनी बात बता कर बहुत हल्का महसूस कर रही हूँ हम चाहते है मुझे न्याय मिले और मेरा घर फिर से बस जाये।

साक्षात्कारकर्ता-ओंकार
संघर्षरत पीड़िता -बसन्ती देवी

‘‘अभी एक गम को भूला ही नही पायी थी कि दूसरी मुसीबत ने तो तोड़कर मुझे रख दिया’’

हमारे भारतवर्ष में इस समय बेरोगारी और भूखमरी इस कदर पाव पसार चुकी है कि हर नौजवान अपने परिवार को दो वक्त की रोटी के लिए हर समय अपनी जिन्दगी को दाव पर लगाकर उसके आगाष में समाता जा रहा है। ऐसे ही एक परिवार जिसको ऐसे ही नौजवान को दो वक्त की रोटी के इन्जाम में खुद अपनी जान गवानी पड़ी उसी को विधवा की कहानी उसी की जुवानी से सुने।
मेरा नाम पूजा देवी है मेरी उम्र 28 वर्ष है। मेरे पति स्व0 अवधेश पटेल है। मै ग्राम-बाबूपुर,पोस्ट-दादुपुर,थाना-धुरपुर, ब्लाक-चाका, तहसील-करछना, जिला-इलाहाबाद का मूल निवासी हूँ। मैं अशिक्षित हूँ। आज से 13 वर्ष पूर्व पहले मेरा विवाह अवधेश पटेल से हुआ था मेरे तीन बच्चे थे। जिसमें से अभी आठ दिन पहले 20 नवम्बर, 2013 को मेरी आठ महीने की बच्ची खुशी के पेट में थोड़ी सी तकलीफ हुई थी तभी वह इतनी बढ़ गयी कि उसे हम लोग चिल्लर अस्पताल इलाहाबाद ले गये वह तेज-तेज रो रही थी। दर्द से कराह रही थी। जब हम उसे वहा ले गये तो पता चला कि उसे निमोनिया हो गया है, अस्पताल वालो ने जवाब दे दिया और वह उसी वक्त उसकी मृत्यु हो गयी। अभी एक गम को भूला नहीं पायी थी कि दुसरी मुसीबत ने तो मुझे तोड़कर रख दिया पबत की मौत के गम को भूल नहीं पायी थी कि बेटी भी छोड़कर चली गयी।
            3 अगस्त, 2013 को तो मेरी दुनिया ही उजड़ गयी। रोज की तरह उस दिन भी सुबह मै खाना बनाकर घर के कामो में लगी थी उन्हे खाना दिया उनकी तबीयत कुछ ठीक नहीं थी उनका काम पर जाने का मन नहीं था वह बिजली का काम करते थे। जब भी बिजली विभाग में कही काम होता था तब वह लोग इन्हें बुला ले जाते थे, यह प्राईवेट काम करते थे। उस दिन भी करीब 10:00 बजे राजेन्द्र प्राईवेट मिस्त्री का फोन आया बोले रामआसरे (सरकारी बिजली कर्मी) बुला रहे है, उस समय उनका जाने का मन नहीं था। वह बोले मै आज नहीं आ रहा हूँ तब वह लोग चौकठा परेड पर थोड़ा काम है करके चले जाना। यह सुनकर वह तैयार हो गये। मै बोली जब मन नहीं है तब क्यों जा रहे है बोले अभी आ आऊॅगी यही कहकर चले गये। वहा जाने के बाद चौकठा का काम खत्म करने के बाद सारेगोपुर में खम्भे पर चढ़े थे। राजेन्द्र बोला ईट बाधकर उतरना तभी ईट बाधॅते-बाधॅते लाईट आ गयी पावर इतना ज्यादा था कि तुरन्त उन्हे जलाकर उनका खूर चुसकर इन्हें छोड़ दिया। 
       उनके जाने के बाद मै घर के कामो में फिर से लग गयी। शाम के 5:00 बजे मेरे जेठ के फोन पर फोन आया कि इन्हे करेन्ट मार दिया यह सुनकर वह उनके पास गये। उस समय मुझे नहीं मालूम था कि उनकी हालत बहुत खराब हैं मै सोची थोड़ी कही तार जोड़ रहे होगे। करेन्ट लगा होगा। कुछ देर बीत जाने के बाद जब कोई खबर नहीं मिली तो मेरा मन घबराने लगा। कोई उस समय मुझे कुछ भी नहीं बता रहा था जैसे-जैसे समय बीत रहा था। मेरा मन घबराता उस समय घर में सभी औरते ही थी किसके साथ उनको देखने जाऊ फोन लगाकर पूछती तो कहते सब ठीक है, वह ठीक हो जायेगे। लेकिन अन्दर से इतनी घबराहट हो रही थी कि न कुछ खाते का मन करता न ही सोने का रात भर रोती बिलखती रही जब भी आँख बन्द करने की कोशिश करती तो जैसे लगता सब कुछ सामने अधेरा सा छा गया। अभी बेहोश हो जाऊॅगी। आँख से तेज आँसू निकलने लगा घर में चारो तरफ कोहराम मच गया लोग रोने विलखने लगे। बच्चे भी घिघियाकर रोने लगे बस उस समय यही लग रहा था कि यह क्या हो गया लोग मुझे सभाल रहे थे। यह सब हमें ढाढ़स दे रहे थे। लेकिन उस समय मुझे यही लग रहा था कि सब कुछ खत्म हो गया सब यही सोचती, वह नहीं गये होते तो आज उनके साथ यह नहीं होता।
            शाम को 5:00 बजे पोस्टमार्टम के बाद उनकी मिट्टी आयी उस समय जैसे लग रहा था यह क्या हो गया। मैं दौड़कर उन्हें देखने गयी उनका पूरा बदन बुरी तरह से जल गया था सिर्फ चेहरा ही बचा था। ऐसे लग रहा था कि भगवान ने हमे उनकी आखिरी दर्शन कि लिए उनके चेहरे को सही सलामत रखा था। वह उनको आखिरी बार देखने भी नहीं आये। कुछ देर बाद उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। मेरा सब कुछ खत्म हो गया। उस दिन उनका काम पर जाने का एकदम मन नहीं था। लेकिन उन लोगों ने उन्हें बुलाकर उन्हें मौत के मुंह में ढकेला। रामआसरे सरकारी कर्मचारी है और राजेन्द्र छोटे लाल प्राईवेट है। जब यह लोग जान रहे थे कि यह खम्भा पर चढे़ है तो यह लोग क्यो नहीं लाईन को कटवाये क्यों लाईन को चालू रखे है। उनका तो कुछ नहीं बिगड़ा मेरा तो सब खत्म हो गया। बच्चों के सिर से बाप का साया हट गया। अभी तेरही बीती थी कि कुछ दिन बाद आठ महीने की खुशी भी चली गयी इस समय जैसे मेरे परिवार पर गमो का पहाड़ टुट गया है। दो बच्चे है शिखा 7 वर्ष की और कुन्दन सिंह पटेल ढेड़ वर्ष का उन सब की परवरीश अकेले कैसे करू कुछ समय में नहीं आ रहा है। उनकी पढ़ाई-लिखाई कैसे करू। मेरा सब कुछ खत्म हो गया। मै चाहॅती हूँ कि सरकारी कर्मचारियों के ऊपर केस हो और न्याय मिले।
            मै अपनी कहानी को बताकर मेरे मन हल्कापन महसूस हुआ।

साक्षात्कारकर्ता - फरहद शबा खानम्                             
संघर्षरत पीड़िता - पूजा देवी

                                         



’’मेरे घर वालो को मेरे मारने की खबर मिली’’

        इस समाज में बरसो से लोग न्याय के लिए जगह-जगह ठोकर खाते है। हर राहपर आने लिए  मुश्किल खड़ी कर दी जाती है। सहारा और हमदर्दी के लिए कोई भी हाथ नही बढ़ाता है। एक गरीब और छोटी जाति का व्यक्ति इसका सबसे बड़ा शिकार है। ऐसी है कठिन डगर न्याय की तलाश में एक मजलूम पीड़ित की कहानी उसी के दर्द को बया करती है।
            मेरा नाम जीत लाल है, मेरी उम्र 38 वर्ष मेरे पिता भाई लाल है। मै ग्राम-नीबी खाई, पोस्ट-करछना, थाना-करछना, ब्लाक व तहसील-करछना, जनपद-इलाहाबाद की मूल निवासी हॅू। मै जाति की चमार हॅू। मैं बनी मजदूरी करता हॅू। मै कक्षा 5 तक पढा हॅू।
            मेरी कहानी यह कि हमको जहा कही भी काम मिलता था। मै जाकर करता हूँ| गाँव हो या गाँव के बाहर। 17 जनवरी, 2013 की बात है। गाँव के बगल में काम कर रहे थे। सुबह के 9:00 बज रहे थे। मैं उनके घर पैसा लेने गया तो तभी सामने के अतुल कुमार, सोनू विपिन और प्रवीण अतुल ने मुझसे काम करने के लिए कहा मै बोला डेबई नाथ के यहा दो दिन काम बचा है उसके बाद मैं आपके यहा करूगा यह सुनते ही वह लोग गुस्से से लाल हो गये मुझे जूता, चप्पल लाठी डन्डे से पीटने लगे। मै चिल्लाने लगा आस-पास लोग खडे होकर लमाशा देख रहे थे। मै अपने आप को बचाने की कोशिश कर रहा था। लेकिन उन लोगो ने मुझे इस तरह घेर रखा था और लगातार मुझ पर वार कर रहे थे। कि मेरा बचना मुश्किल था। उसी मे से एक व्यक्ति ने बोला तो उन लोगो ने उसे तमंचे से मारे, उन लोगो ने मुझे अधमरा कर छोड़ दिया था। पास खड़े लोगों में से कोई भी हिम्मत नहीं दिखायी। उन ठाकुर लोगों के खिलाफ किसी ने आगे आकर मदद नही की! मैं खून से लथपथ था। मेरे घर वाले इन बातो से अन्जान थे। किसी तरह हिम्मत कर उठा। गाँव के प्रधान सोनू पंण्डित के यहा गया वह मुझे पीपल के पेड़ के नीचे हमको लिटाया गया मै दर्द के मारे मेरी जान निकल रही थी। थानेदार साहब एफ0आई0आर नहीं लिख रहे थे। 2:00 बजे तक कहते रहे लेकिन न एफ0आई0आर लिखा गया न मुझे मेडिकल के लिए भेजा गया। जब कोई भी सुनवाई मेरी नहीं हो रही थी। तब प्रधान जी कह चला इलाहाबाद एस0एस0पी के कार्यालय चलो यह सुनकर थानेदार ने मेरी शिकायत लिखी। लेकिन बात-बात में वह सुलह समझौते कराने की बात कर रहे थे। मै अढ गया तब उन लोगो ने मुझे करछना ब्लाक में मेडिकल के लिए भेजा। मेरी हथेली खुल गयी थी। वह हमको इलाहाबाद रेफर कर दिया गया। वहा एस0आर0एन मे मेडिकल हुआ। मेरे घर वालो को खबर मिली की मुझे जान से मार दिया गया। यह सुनकर मेरी बीबी व बच्चें मुझे देखने घटना स्थल पर आये तब उन लोगों द्वारा उन्हे गाली व धमकी दी गयी कि अभी तो बच गया है अब नही छोडेगे। मुझे न पाकर वह लोग घबरा गये वह लोग थाने आये। मेरे भाई व पट्टीदार किसी ने मेरा साथ नहीं दिया। मै उस समय विल्कुल अकेला अपने आप को असहाय महसूस कर रहा था। घटना स्थल पर थाने वाले एक गाड़ी भर कर गये थे लेकिन आरोपी पक्ष का एक भी व्यक्ति नहीं पकड़ा गया। मेडिकल में मेडिकल रिपोर्ट देने के लिए दुसरे दिन बुलाया गया था। मेरी हालत इतनी खराब थी सारा बदन में चोट का निशान था मेरे अन्दर उठने के हिस्मत नही थी। इस कारण मैं नही जा पाया। घटना के दस से पन्द्रह दिन के बीच में क्षेत्राधिकारी करछना के यहा जाने के लिए एक वकील ने मुझे बताया बोला दोनो पक्ष को बुलाया गया है। मै डर के कारण वहा नहीं गया। जब थाने में चोट लेकर इतना झेल रहा था। कोई सुनवाई नहीं हो रही थी तो वहा कौन सुनेगा। उन लोगो द्वारा मुझे बार-बार मामले को दवाने के लिए धमकी मिला रही थी। वह लोग दूसरो से कहलवाते जान से मार देगे वह मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते यह सब सुनकर मै और मेरी परिवार और धबरा जाता था किसी ने हम लोगो का साथ नही दिया। मेरे घर परिवार के सदस्य लोगो ने भी कुछ नही समझा यह सब देखकर कही भी मदद न मिलने के बाद में वहा जाकर अच्छा नहीं लग रहा था।
       हमको बहुत शर्मिन्दगी महसूस हो रही थी। लेकिन मजबूरी थी क्या करता। उस दिन को याद करता हॅू तो मेरे रोय खडे़ हो जाते है। वही रहकर दवा इलाज किया जब हालत में कुछ सुधार आया तो वहा से वापस अपने गाँव आ गया। उस समय आने के बाद इतना खराब लग रहा था कि क्या बताऊ गाँव में कोई मुझे देखे ना इस कारण गाँव से वाहर के रास्ते से होकर जाता था। वह लोग भी मेरी खबर दूसरो से रखते थे कि कही कोई कार्यवाही तो नहीं की जा रही है। वह बहुत मुश्किल का दिन था बार-बार वह घटना आँखो के सामने चलती रहती थी, दो महीने तक मै इधर उधर भागता रहा लेकिन कही से कोई मदद नहीं मिल रही थी। इन आरोपियों का इतना दबाव था कि कोई भी मदद करने के लिए आगे नही आना चाहता था। इसी तरह बीतता गया। दिन रात मै और मेरी पत्नी बच्चे चिंता में लगे रहते हर समय डर लगा रहता था। दो माह बीतने के बाद एक कागज (नोटिस) आया मै इस बारे में बहुत कुछ नहीं जानता था गाँव में किसको दिखाऊ यह सोचकर इलाहाबाद एक वकील से मिला उसे दिखाया उसने बताया उसका पूरा कागज निकलवाया तो बोला तुम्हारा मामला खारिज हो गया है। गाँव के ही लगभग 15-16 लोगो ने तुम्हारे खिलाफ गवाही दी है। उसमें सभी जाति विरादरी के लोग है। उसमें से कुछ लोग हमारी विरादरी के है उन लोगो ने उल्टा ही मेरे खिलाफ गवाही दी है। उसमें से जिन्हे मै जानता था उनसे पूछा तो उन लोगो ने कहा नहीं मैने कोई गवाही नही दी है। कुछ आशिक्षित गवाहदार जिन्हे हस्ताक्षर नहीं करना आता था। उनके भी हस्ताक्षर उस गवाह के कागज में है, उसे देखकर मै और तकलीफ में आ गया। मैं वही खड़ा का खड़ा रह गया था। सोचता रहा इन दुनिया में एक गरीब छोटी विरादरी का मजदूर न्याय की उम्मीद नहीं लगा सकता है। मेडिकल भी सही तरीके से नहीं हो पा रही थी। उस आरोपी का लड़का प्राईवेट अस्पताल जीवन ज्योति में है उसने सरकारी डाक्टर से सम्पर्क करके सभी कुछ दवावा दिया। जब तक उन लोगो ने झूठी गवाही दिलवा नहीं दिया तबसे मामला दवा दिया गया वह हमारे पीछे लगे रहे। जहा मै जाता था वहा वह पहूच जाते थे। जब सब एक साथ हो जाते थे तब गाँव में कहते है अरे उसको मारा उसने मेरा कुछ नही बिगाड़ा यह कहकर हॅसते हुए जाते है जब सुनता हॅू तो मेरे शरीर में आग लग जाती है। बहुत गुस्सा आता है। गाँव के भी कुछ लोग बोली मुझे देखकर बोलते थे मै बहुत बर्दाश्त करता था। अभी भी कर रहा हूँ।
            रात को जब सोता हूँ तो जिस तरह उन लोगो ने मेरा कालर पकड़ कर लात घूसो से मारा था वह मेरे आँख के सामने घुमता रहता है। इस घटना के बाद से हमेशा चिन्ता बनी रहती हैं। उनकी दबंगई अभी भी कम नहीं हुई है वह लोग मौका तलाशते रहते है। यह ऐसे लोग है कि काम करने के बाद इनसे कोई भी मजदूरी न मागे अगर उसने कुछ कह दिया तब वह उसके खिलाफ होकर उस पर अत्याचार करेगे। मैने भी हिम्मत नहीं हारा है। अभी फिर मुकदमा कायम करने के लिए मामला दाखिल किया है जब साहब कह रहे है जब फाइल पढेगे तब कोई कार्यवाही होगी। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग नई दिल्ली लिखा पढ़ी की अभी वहा भी कोई सुनवाई नहीं हुई। अगर घटना के समय आप मिले गयी होती तो शायद मुझे इतना न भटकना पढ़ता।
            मैं यही चाहता हॅू कि मेरे साथ न्याय हो उन आरोपियों को उनके किया कि सजा मिले। भगवान मेरी विनती सुन ले नहीं तो लोगो का न्याय व भगवान दोनो पर से विश्वास उठ जायेगा। मुझे अभी भी उन लोगो से डर है लेकिन मै हिम्मत नहीं हारा हूँ।

साक्षात्कारकर्ता - फरहद शबा खानम्                            
संघर्षरत पीड़ित- जीत लाल  

                                     

  

मेरी बर्बादी का दिन मुझे पता होता तो मै जीवन भर कुवारी ही रहती।

      हर लड़कियों की तरह मेरे भी सपने थे। मेरी शादी होगी और एक हमसफर होगा। जो मेरे दुःख दर्द को समझेगा और बाटेगा लेकिन मुझे क्या पता था मेरे सपने सिर्फ सपनों में ही सीमट कर रह जायेगे। और उसके बदले मिलेगी बदकिस्मती। मेरी बर्बादी का दिन अगर मुझे पता होता की आयेगा तो मै जिन्दगी भर कुँवारी ही रहती।
मेरा नाम श्वेता कुमारी उम्र 19 वर्ष है। मेरे पिता का नाम स्व0 रामजनम राम और माता का नाम आशा देवी है। मेरी तीन बहन और एक भाई है। बहनों में मैं सबसे छोटी हूँ। मै निवासिनी एस 23/81-पी-25 ढेलवरिया, चौकाघाट पानी टंकी थाना-जैतपुरा वाराणसी की हूँ। मै हाई स्कूल का फार्म भरी थी, लेकिन परीक्षा नही दे पायी। जिसके लिये मैने अपना परिवार और इज्जत दाव पर लगाकर उसके पास गयी, आज वो मुझे इस कगार पर लाकर खड़ा कर दिया।
मेरे पति का नाम प्रीतम पाण्डे उम्र 22 वर्ष ससुर का नाम उमानन्द पाण्डे, सास का नाम, मीरा देवी ननद किर्ती पाण्डे, देवर का नाम किशन पाण्डे निवासिनी प्लाट न0 33 चौकाघाट ढेलवरिया, थाना जैतपुरा जिला वाराणसी के है।
मुझे नही पता था कि मेरा पति प्रीतम पाण्डे मेरे साथ विश्वासघात करेगा। मैने अपने जिन्दगी के बहुत सारे सुख के सपने देखे थे, लेकिन सारे सपने अधुरे रह गये। मेरा पति प्रीतम पाण्डे मेरा पड़ोसी है। हम लोगों को मोबाइल से बात करते-करते प्यार हो गया और हम दोनों लोग बिना घर के इजाजत से 7 महीना पहले मारकण्डे मन्दिर से शादी किये। और शादी कर के मेरे पति अपने घर में ले गये, लेकिन मेरे ससुराल में सास-ससुर दरवाजे के अन्दर घुसने नही दे रहे थे। हम इसको नही रखेगे तब मोहल्ले वाले मेरी सास-ससुर को समझाये कि छोड़ा जायदा जउन भल तउन भल तोहार लड़का भी त गलती कइले ह।
मुहल्ले वाले का बात सुनकर मेरी सास अन्दर आने दी। लेकिन अन्दर आने के बाद हम भुखे पेट सो गये, मेरे पति अपने हाँथ से निकालकर खाना खाये लेकिन हमसे नहीं मांगे और कहने लगे की हम तुम्मारा सकल भी नहीं देखना है। सुबह होते ही मेरी ननद प्रिती पाण्डे और उसका छोटा देवर धड़धड़ाकर घर में घुस गयी, और हमको मारने लगी, मैं हड़बड़ाकर उठ गयी कि कौन मुझे मारने लगा, मै रोने लगी लेकिन मेरे पति अपने बहन को कुछ नही बोले चुपचाप खड़े होकर देख रहे थे। मै रोते-रोते खाना बनाने लगी, मै खाना बनाकर सबको खिलाई लेकिन जब मै खाने चली तो मेरी ननद आगे से थाली छिन ली, मै भुखे पेट रह गयी शाम होते ही मेरे ननद अपने ससुराल चली गयी। मेरी सास कहती थी की यह दूसरी जाती की है इसको हम नौकरानी बनाकर रखेगे।
सुबह सोकर उठने में देर हो जाता था तो सब लोग हमको गाली देने लगता था। सुबह-सुबह इतनी गन्दी-गन्दी गाली देते थे कि सुना नही जाता था। मेरी सास हमको पहनने के लिये फटा साड़ी और ब्लाउज दी थी। हम उसको सिलकर पहनते थे। करते भी तो क्या करते अपने माता-पिता के घर भी नहीं जा सकते थे, क्योंकि अपने माता पिता से बिना बताये हम घर से निकल गये थे। यही सब सोचते-सोचते दिन कट जाता है। बीस दिन हुआ था ससुराल में रहे इक्कीसवे दिन मेरी सास हमको मेरे पति को घर से निकाल दिये। उस समय ऐसा लग रहा था न घर के हुये न घाट के किसी तरह मेरे पति किराया का कमरा नाटी इमली में खोजे उसी जगह किराये पर रहने लगे, मेरे पति के पास पैसा नही था, मेरे पास मोबाइल था, उसको बेचकर घर का राशन मगाये हम सोचे की अभी परेशान है, जब सब ठीक हो जायेगा तब काम करेगे तब अपना गृहस्थी खुद सभालेगे। लेकिन जैसा मै सोची थी बिल्कुल उल्टा हो गया मेरा पति अपने घर जाकर खाँ लेता था और मैं भुखे पेट सो जाती थी, घर में खाने के लिये कुछ नही रहता था, लेकिन मेरे पति को कोई फर्क नही पड़ता था की मेरी पत्नी खाना खायी है या नही धीरे-धीरे मेरा तबियत भी खराब होने लगा, पड़ोस के लोग मुझे डाक्टर को दिखाने ले गये तो पता चला कि मैं गर्भवती हूँ। डाक्टर की बात सुनकर मुझे बहुत चिन्ता हो गयी मै सोचने लगी की मेरा पति मुझे खिला ही नही पा रहा है तो बच्चा को कहा परवरिश करेगा, जब अपने पति से बतायी कि मुझे बच्चा है तो मेरा पति सुनकर मारने लगा बोला तुम जहाँ से आयी हो वह जाओ मै तुम्हारे साथ नही रह सकता, जब से तुमसे शादी किया हूँ। मेरी जिन्दगी बर्बाद हो गयी।
अपने माता-पिता के मर्जी से शादी किया होता तो न जाने कितना दहेज मिलता, तुम पता नी कहाँ से मेरे जाल में फँस गयी मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे छोड़ कर चली जाओ कम से कम मुझे छुटकारा मिल जायेगा तुमसे अगर मुझे छोड़ कर नही जाओगी तो इसी तरह भुखे पेट मरोगी। मैं दिन रात भुखे पेट रोते-रोते मुझे चक्कर आने लगता मै चाहती हूँ कि मेरा पति जिस तरह मुससे शादी किया है, उसी तरह निभाये क्योंकि मैने अपने माता-पिता के खिलाफ शादी किया है, पता नहीं वे लोग हमे इस हाल में मुझे अपनायेगे की नही आप से बात तो जरूर कर रही हूँ’ लेकिन मेरा पैर हाँथ काँप रहा है। मै क्या करू कुछ समझ में नही आ रहा है। अपने पति के पास जाने में डर लग रहा है कहीं मुझे जान से न मार डाले रात दिन चिन्ता लगी रहती है, डर के मारे नींद नही आती है। मैं डर-डर के अपने मैके गयी लेकिन वह लोग हमको अपना लिए| हम चाहती हूँ की मेरे पति व ससुराल वालो को सज़ा मिले और हमे न्याय मिले|
आपसे अपनी कहानी बता जरूर रही हूँ लेकिन मन शान्त नही है।
                                                                      
साक्षात्कारकर्ता- छाया कुमारी  
संघर्षरत पीडिता- स्वेता कुमारी



पत्नी व बच्ची को गाँव में छोड़ दूसरे महिला को पास जीवन बिता रहा है।

 अभी भी हमारे समाज में पुरुषवादी सोच कितनी निम्न स्तर की है लड़की से शादी करके उसको घर की नौकरानी समझ कर घर के चार दिवारी में कैद कर लेते हैं और अपने वाहर दुसरी महिला के साथ मजा लेते है। आइये एक ऐसी महिला की दर्द भरी कहानी उसी की जुवानी से सबरू कराते है।
            मेरा नाम संगीता उम्र 25 वर्ष है मै जाति की चमार हूँ। हम लोग पाँच बहन चार भाई मैं ग्राम-फरीदपुर पोस्ट-सारनाथ सुल्तानपुर वाराणसी की निवासी हूँ|
मेरी शादी 6 साल पहले बबलू पुत्र हरिनाथ ग्राम- नोआये पोस्ट-थाना गद्दी, जिला-जौनपुर में हुई है मेरे मैके वालो की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है फिर भी मेरे माता-पिता रीति रिवाज के साथ मेरे शादी की थी और दहेज व समान भी दिया गया था। इस समय मेरे पास दो बच्चें है बेटा का नाम करन और बेटी का नाम रोशनी है।

मेरे सास का नाम साबित्री देवी, तथा देवर का नाम बहादूर जेठ का नाम गुड्डू दुसरे देवर का नाम नीरज है। मेरे पति बम्बई में एक स्टील के कम्पनी में काम करते है। हम ससुर के साथ रहते है। जेढ साल तक सब ठीक था जब से मेरे पति बम्बई गये है तब से उनके अन्दर परिवर्तन होने लगा है। सोचती रहती हूँ आखिर क्या बात है क्यों घर पर नहीं आते है फोन भी नहीं करते है। मन में सोचती थी कि आखिर मेरे साथ क्या हो रहा है इधर पति के न रहने पर मेरी सास ननद खाना नहीं देती थी, जब कुछ बोलते थे। मेरा देवर मारने लगता था कहता था भाग जाओं अपने घर यहाँ पर तुम्हारा कोई नहीं है। मैं रोते-रोते सो जाती थी मेरे बच्चे भी भूखे सो जाते थे। एक दिन मेरा भाई(राजेश) बम्बई परीक्षा देने गया था परीक्षा देने के बाद वह सोचा कि चलकर अपने जीजा से भी मिल लेगे जब मेरा भाई अपने जीजा से मिलने गया घर में प्रवेश करते ही देखा की मेरे जीजा के कमरे में एक महिला सोयी है। मेरा भाई देखते ही उल्टे पाव लौटकर आ गया। यह सब देखकर वह सोचते हुए रास्ते भर आया की मेरी बहन ससुराल में दो बच्चों को लेकर खट रही है। और ये यहाँ मजा ले रहा है। मेरा भाई तुरन्त हमको फोन करके बोला तुम अभी ट्रेन पकड़कर बच्चों के साथ बम्बई चली आओ मै फोन पर ही अपने भाई से पूछी क्या बात है लेकिन मेरा भाई बोला फोन पर तुमको क्या बात बताये, मैं अपने भाई के बुलाने पर बम्बई गयी मेरा भाई मुझसे मिलकर सारी बातो को बताया, मै अपने मन में सोचने लगी कि मेरा पति मेरे और बच्चों के साथ विश्वाष घात कर रहा है। मैं सोचते-सोचते अपने पति के पास पहुँची वहाँ पर पहूँची तो धीरे-धीरे मैने सारी बातो को पता किया तो बात सही निकला।
मैने अपने पति को बहुत समझाया लेकिन मेरा पति नहीं माना बोला कि तुम चुपचाप घर चली जाओं नही तो तुमको मार डालेगें, मै अकेले परदेश में करती भी तो क्या करती, कभी रात को आता कभी नहीं आता था ज्यादा मैं बोलती थी मारने लगता था, घर में खर्च के लिये भी पैसा नहीं देता था। बम्बई में मेरे पति जहाँ रहते थे वहाँ के आस-पास की महिलायें बताने लगी की तुम्हारा पति तुम्हारे न रहने पर रोज शाम को एक महिला को साइकिल पर बैठाकर लाता था, और सुबह बैठाकर ले जाता था। मैं सबकी बात सुनकर चुप रहती थी, कुछ समझ में नही आता था। कि क्या करू मै बस बच्चों को लेकर रोती रहती थी एक दिन मेरा पति हमको मार पीटकर जबरजस्ती घर पर पहुँचा दिया और धमकी दे रहा था कि यी, तुम यहाँ से चली जायो नहीं तो तुमको हम मार डालेगें मैं डर के मारे उनके साथ अपने ससुराल चली आयी। मेरे पति हमको ससुराल में छोड़कर चले गये| मैं जब अपने सास, ननद से सारी बाते बतायी तो मेरी सास उल्टे हमको गाली देने लगी, मेरे बातो पर विश्वाष नहीं कर रही थी।
मेरे पति जब होली को घर पर आये तो हमसे बात नहीं कर रहे थे, मैं बहुत समझाना चाहती थी, लेकिन मेरे पति को मेरी बात सुनना पसन्द नहीं था। मेरे पति होली के बाद बिना मुझसे बताये बम्बई भाग गये, ये बात मेरी ननद ने बतायी की भैया भाग गये। मन सोचने लगी की मै कर भी क्या सकती हूँ पति पत्नी का जुडाव न होने से इसका फायदा सास-ससुर ननद, देवर जेठ उठाने लगे जब जिसको मन करता था वह गाली देने लगता था जेठ देवर मारकर घर से ही भगाने लगे, मैं सोचने लगी की कितने दिन बच्चों को लेकर भूखे रहगे इसलिये मै अपने मैके चली आयी थी। उसी तरह हो जाये तो अपने परिवार और बच्चों के साथ रहे। उस महिला का साथ छोड़ दे। बनारस में कहीं भी नौकरी करे और मेरी सास ससुर हमे प्रताड़ित करना छोड़ दे।
आप से मिलकर भी बहुत अच्छा गला मुझे उम्मीद है कि मुझे न्याय जरूर मिलेगा।

साक्षात्कारकर्ता - छाया कुमारी                                          

संघर्षरत पीड़िता -संगीता देवी