Tuesday, 21 April 2015

दबंग द्वारा गरीब अनुसूचित जाति के लोगो को प्रताड़ित किये जाना !

मेरा नाम राजकुमार पुत्र स्व0 रमाकान्त उम्र 29 वर्ष ग्राम-तियरा (मानपुर) पोस्ट-विच्छी थाना-राबर्ट्सगंज, जिला-सोनभद्र का निवासी हॅू। मै गरीब अनुसूचित जाति (चमार) का हूँ। मै अपने परिवार का पालन पोषण मजदूरी करके करता हूँ। मेरे 2 लड़के तथा 2 लडकियाँ है।
घटना जुलाई 2012 की है। जब मैं अपनी जमीन जोतने से मना करने गया तो रमाशंकर रमेश यादव, मुनीब यादव, अर्जून यादव, पुत्र स्व0 मंगरू यादव जो कि मेरे गाँव व घर के बगल के ही है। उल्टा मुझे तथा मेरी माँ-बहन को भद्दी-भद्दी गालिया देने लगे तथा लाठी व कुल्हाड़ी लेकर आ गये। और गाली देते हुए कहने लगे कि तुम जब छोटे थे तब हम लोगो ने क्या किया था तुमको मालूम नहीं हैं। तुम्हारे बाप को और तुम्हारे दादा बैजू को ऐसी मार मारे कि हाथ टुकडे-टुकडे हो गये। हम लोगो पर एसी/एसटी कानून कुछ नहीं हुआ जेल जाना तो आसान है तुम्हारा धारा कानून कुछ नही करेगा। हम लोगो के मार से तुम्हारे दादा बाप दोनो मर गये। जिसे हम लोग मारते है। वह ज्यादा दिन तक नही रह सकता। अब तुम इस जमीन को हक जमाने आये हो तो तुम्हारा भी वही हश्र होगा जो तम्हारे बाप दादा का हुआ था।
       इस जमीन का चक्कर छोड़ दो हम लोग इसे लूट लिए तो लूट लिए। मरना है तो फिर वोलो तम्हारा बाप भी था कि बडे से बडे अधिकारी और थाना कोतवाली सभी को प्रार्थना पत्र देते-देते मर गया कुछ नही कर सका। अब तो तुम्हारा भी इलाज हम लोग कर देगे। मै जब छोटा था तब अपने बाप और दादा के साथ हुई घटना को देखा था फिर मेरे दिमाग पर वह दिन याद आया और मै डर के मारे कापने लगा। फिर मेरी जमीन सरहंगो गुण्डो ने जान से मारने की धमकी देते हुए मेरी जमीन जोतने लगे। मैने पूर्व में जिलाधिकारी महोदय को भी प्रार्थना पत्र दिया था जाँच में लेखपाल आये। और मुझे अपने क्वाटर पर बुलाए और बोले कि यहाँ सभी मुख्य पदो पर यादव विरादरी के अधिकारी है। पुलिस यादव की बात ही करेगी।  और सपा का शासन है। मैं कुछ करने में असमर्थ हूँ। क्योकि मैं इसका इल्जाम बहुत भोग चुका हूँ । अब नहीं भोगना चाहता हूँ । मेरे साथ मेरी विधवा माँ व नावालिक एक भाई व बहन है। दबंग बहुत प्रभावशाली वाले हैं। हम दलित गरीब की सुनवाई कही होती नहीं है आये दिन दबंग गाली गुप्ता देते रहते है। तथा जमीन को जोता बोया करते रहते हैं।
      मेरे जमीन का नम्बर 128 ख रकबा 4 विश्आ है। जिसे मेरे पिता रमाकान्त ने रामधारी यादव से अपने गुजर बसर के लिए खरीदा था जब तक रामधारी जीवित था तब तक तो मंगरू व उनके लड़के ने कोई परेशानी नहीं किया। फिर जब रामधारी मर गये तो मंगरू व उनके लड़के लाठी-डन्डे व गुण्डई से जमीन कब्जा कर हम लोगो को जाति सूचक शब्दो का प्रयोग करते है। और कहते है कि  तुम्हारी कही सुनवाई नहीं होगी। इतना ही नहीं कब्जा भी किये तथा उल्टा उपरोक्त आराजी पर काटवंदी का मुकदमा न्यायालय तहसीलदार मजिस्टेªट चल रहा है। जब कि वर्तमान में मुकदमा की तारिख देखते है और गुहार लगाते रहे मगर कोई सुनवाई नही हुई। बाद में मेरे पिता की मृत्यु हो गयी व दबंग मंगरू यादव भी मृत्यु हो चुके है। पुनः मुकदमा राजकुमार व अवधेश कुमार (नावालिक) स्व0 सुमित्रा देवी के नाम से माननीय उपजिलाधिकारी के यहाँ चल रहा है। जब कि मैं मुकदमा लड़ने में असमर्थ हूँ मै यही सोचता हूँ कि भगवान हम गरीबो दलितो का जन्म इस संसार में क्यो दिया। जब यह दुनिया गुण्डो व दबंगो के लिए है। जब न्यायालय और अधिकारी गुण्डो व दबंगो के प्रभाव के आगे नरवस है। मुझे तो लगता है। कि मेरी जमीन अब वापस मुझे नहीं मिल पायेगी। क्योकि मेरे पिता व दादा जैसे मुझे भी हाथ पैर तुडवाना पडेगा और मृत्यु का भोग भोगना पडे़गा ऐसा लगता है। कानून भी दबंगो के लिए है। गरीबो दलितो के लिए तो केवल दिखावा हैं
अपनी कहानी बताने में मुझे बहुत पीड़ा महसूस हो रहा है फिर भी कहानी बता कर कुछ हल्कापन समसूस कर रहा हूँ और हम चाहते है कि हमें न्याय मिले और दबंग लोगो को सजा।
  साक्षात्कारकर्ता                                    संघर्षरत पीड़ित
 श्याम जी$पिन्टू गुप्ता)                              (राजकुमार)                                                                                                          




अपनी किस्मत पर रोऊँ या बेटी के !

       किसी माँ की बेटिय दहेज की बली चढ़ने के लिए पर गुजरती रहेगी उन्हे दहेज के नाम पर ससुरल मे कब तक सताई व मारी जाइ गी ऐसी ही कहानी एक गरीब माँ की जुबानी !
मेरा नाम सोम्मर है मेरी उम्र 50 वर्ष है मेरे पति प्रकाश है, मै ग्राम-बहेरा, थाना-करमा, ब्लाक-करमा जिला-सोनभद्र की रहने वाली हूँ। मेरी दो लडकियाँ व एक लडका है सभी विवाहित है। हम लोग बनी मजदुरी कर अपना जीवन गुजार एक लडके व लडकी की शादी की इसके बाद कोई चिन्ता नही थी, लेकिन बेटी मालती की शादी के बाद ससुराल वालो द्वारा पैसा माँगना तथा बेटी के ऊपर अत्याचार किये जाने के कारण मन बहुत दुःखी रहता है।
        21 जून, 2012 को कन्हैया पुत्र इन्द्रबहादुर ग्राम-करकीमैना, थाना-करमा, जिला-सोनभद्र में शादी किया। उस समय लगा कि अब सब जिम्मेदारी से मुक्ति मिल गयी। बड़ी बेटी और दामाद ने अच्छा घर-बार देखकर यह रिस्ता बताया था। लेकिन धीरे-धीरे यह सब भ्रम खत्म होता दिख रहा था। एक दिन मेरी बेटी का फोन आया, मेरी बेटी ने रो-रोकर अपने साथ हुये अत्याचार के बारे में बताया। यह सुनकर मैं घबरा गयी और कुछ पैसों का इन्तजाम कर उसे लेने चली गयी। बेटी की मा होने के कारण उसके ससुराल में कुछ नहीं बोला और बेटी को लेकर वापस अपने घर आ गयी। उसकी हालत देखकर मै बहुत दुःखी हो गयी उससे चला नहीं जा रहा था और वह रोने लगी। वह भी मुझे देखकर रो रही थी। घर पर जो कुछ घरेलु हल्दी-प्याज था उसको लगाकर बांध दी फिर कुछ पैसे का इन्तजाम कर उसे दवा दिलाने ले गयी। वह अपने मुह से कुछ नहीं कह पा रही थी लेकिन उसकी हालत देखकर मुझे बहुत तकलीफ हो रहा था हमे चिन्ता हो रही थी कि क्या बात हैं कि उन लोगों ने इतना बुरा हाल कर दिया हैं। 
       लेकिन गरीबी और जानकारी न होने के कारण चुपचाप बैठ गयी, लेकिन मन दिन-रात परेशान रहने लगा। कुछ दिन बाद धीरे-धीरे बेटी की भी तबीयत सुधर गयी। वह भी बाहर व अन्दर के कामो में मदद करने लगी। लेकिन मेरा मन बार-बार उसके तरफ ही जाता। तभी एक दिन उसके ससुराल वालो का फोन आया कि दशहरा बाद विदाई कराने आयेगें तो मै बोली कि कुछ दिन और रूक जाइए। तब यह बोले कि अगर बाद में विदाई देगे तो टी0वी0 और पंखा सब कुछ देना होगा। गरीब के कारण जो कुछ भी शादी में अपनी हैसियत से अधिक दे चुकी थी। मै बोली अगर बाद में विदाई करूगी तो कहा से इन्तजाम कर करूगी तो मैने सोचा कि उनकी के तारीख पर रखकर विदाई कर दिया। अभी बेटी को ससुराल गये 3-4 दिन ही हुए थे कि फिर फोन आया कि दहेज न मिलने के कारण जलाने की धमकी दी जा रही है। और भाग जाने के लिए कह रहे है। यह सुनकर फिर भागी परायी उसे लेने आयी। गरीबी इंसान को बेवस व लाचार बना देती हैं। हम चुपचाप अपनी बेटी को लेकर चली आयी। उस दिन तो ऐसा लग रहा था कि कहा मैने उसकी शादी कर दी। यह सब देखकर समझ में नही आ रहा था कि क्या करू किससे क्या कहॅू। अपनी किस्मत पे रोऊॅ या बेटी के। चुपचाप मजदूरी में लग गयी। काम करती थी लेकिन दिमाक हमेंशा बेटी के तरह ही रहता। भगवान यह मेरी बेटी के साथ ही क्यों हुआ। वह भी चुपचाप रहने लगी। इन्ही की चिन्ता से मेरी बड़ी बेटी भी दुबली व कमजोर हो गयी। खाने-पीने का कुछ भी मन नहीं करता। आज पड़ोस में भी जाना मना हो गया। रात को सोती हॅू तो उसी की चिन्ता बनी रहती है। उन दिन के बाद से आज तक उसे ससुराल वालों ने कोई खबर नहीं ली। मेरी बड़ी बेटी जब जाती है तो मेरी समधन उससे बात तक नहीं करती है। इस कारण मन में हमेशा डर रहता है कि कहीं यह लोग इसकी शादी की तैयारी तो नही कर रहे है। मेरी बेटी उसी के साथ जाना चाहती हैं। वह बोलती हैं। माँ शादी एक बार होती है। मै चाहती हूँ कि अगर वह मेरी बेटी के साथ अन्याय न करे उसे अच्छे से रखे तो आकर वह विदाई कराके ले जाये।
       मै चाहती हूँ कि लड़का पक्ष वाले कहे और हमारी बात सुन किसी सही निर्णय पर पहूँच कर बेटी की भविष्य को ध्यान में रखकर उचित निर्णय ले। उसके साथ किसी भी तरह का शारीरिक एवं मानसिक यातना न दिया जाय। तब मैं उसके ससुराल वालों के साथ बेटी को बिदाई के लिए तैयार हूँ।
  साक्षात्कारकर्ता                                      संघर्षरत पीड़िता
      पिन्टू गुप्ता                                         सोम्मर

Monday, 20 April 2015

हिन्दुस्तान में हम मुस्लिम को क्यों जीने का अधिकार नही क्यों जूर्म कर रहे है। पुलिस प्रशासन वन विभाग दबंग और स्वस्थ्य विभाग!

मेंरा नाम अब्दुल रहीस खान उम्र-32 पुत्र-सजब खान जाति मुस्लिम हूँ। ग्रामवपोस्ट-चुर्क,चैकी-चुर्क,कोतवाली- राबर्ट्सगंज ,तहसील-राबर्ट्सगंज-जिला-सोनभद्र का निवासी हूँ। मेरे पास कोई लड़का लड़की नही हमारे बस्ती में 30-35 घर है। जिसकी आबादी लगभग सौ से ढेड सौ है। हम गरीब लोग मेहनत मजदूरी करके अपने परिवार भरण-पोषण करते है।
घटना दिनांक 5 फरवरी, 2014 की रात समय लगभग 08:00 बजे अचानक हमारे घर 5-6 गाड़ी फोर्स आयी जिसमें वन रेंजर जगदीश कुमार वन दरोगा संजय दुबे बबुआ यादव पुलिस विभाग दरोगा विनोद यादव पुलिस चैकी की अन्य पुलिस हमारे बस्ती में आये। हमारे समुदाय के बच्चें महिलाओं और पुरुषों को बड़ी बेरहमी से डंडा, थप्पड़, लातो से शरीर के सभी अंगो पर मरने लगे। जिससे चारों तरफ हाहाकार मच गया, चारों तरफ बचाओं-बचाओं की चीख पुकार निकल रही थी। चारों तरफ खून ही खून बह रहा था। जिधर देखो रोने चिल्लाने की आवाज आ रही थी। हम लोगों ने वहाँ पर अधिकारियों से पुछ रहे थे कि साहब हम लोग गरीब को अनानास किस जूर्म के लिए मारा जा रहा है। हम लोग यहाँ पर करीब 30-35 वर्षों से यही पर रह रहे है। इस तरह की घटना पहले कभी नही हुई उसी समय बस्ती के दबंग ओम प्रकाश यादव व इन्द्र बहादुर सिंह अपने आदमियों के साथ आये और बोले की मारों सालों मुसलमानों को उनके आदमियों ने प्रशासन के साथ मिलकर मारना शुरु कर दिये साथ ही साथ हम लोगों का कच्चा मकान तोड़ना शुरु कर दिये। जब हमारी बच्चियाँ और बस्ती के औरतो ने इसका विरोध किया तो उन लोगों खुलेआम जल्लादो की तरह महिलाओं और बच्चियों के साथ जोर जबरजस्ती करने लगे। हमलोग बच्चियाँ और महिलाओं को बचाने का प्रयास कर रहे थे। लेकिन विरोधियों की संख्या के आगे हम लोगों कुछ नही कर पाये। महिलाओं और बच्चियाँ रो-रोकर अधिकारियों और अल्हा ताला से मदद की गुहार लगा रही थी, लेकिन उन लोगों का पीड़ा सुनने वाला कोई नही था। जब विरोधी ने हम लोगों का मकान साथ हो टिनसिट तोड़ना शुरु किये तो लग रहा था की हम लोगों का पुरी-पुरी दुनियां ही उजड़ गयी है। हमारे घर का पुरा सामान अनाज बकरा-बकरी, मुर्गा-मुर्गी कपड़ा तथा नगद 5000/- रुपये सब उठा ले गये। उस समय विरोधियों की लगभग 70-80 की संख्या में थे जो फर्शा, कुल्हाडी, गैता, सब्बल से लोग मेरा घर तोड़ रहे थे।
दबंग ओम प्रकाश यादव, इन्द्र बहादुर सिंह के आदमी एक टैक्टर में लाठी-डण्डे से मौजूद थे। जिनके आगे हम लोगों के मुह से आवाज नही निकल रहा था वो लोग हम लोगों के बच्चियाँ के साथ जबरदस्ती छेडछाड़ करने लगे। उस समय हम लोगों को ऐसा महसुस हो रहा था कि अल्ला हमलोगों को किस गलती की सजा दे रहा है। वहाँ पर किसी को हम लोगों पर दया नही आ रही थी। हम लोगों के आँखों से आँसु ऐसे बह रहा था कि रुकने का नाम नही ले रहा था। हम लोगों का जो सामान लुटे थे वे सब बस्ती के अन्य बिरादरी (हिन्दु धर्म) के लोगों में बाँट दिये।
दिनांक 26 फरवरी, 2014 समय लगभग 10:00 बजे सुबह पर मैं अपनी बच्चियाँ और अन्य पीड़ित/पीड़िता के साथ जिला अस्पताल लोढी सोनभद्र में अपने इलाज और मेड़िकल बनवाने गये। वहाँ पर न तो मेरा इलाज हुआ और न ही परिवार के लोगों का हास्पितल पर पहले से पुलिस वाले मौजुद थे। फिर हम लोग पुलिस अधीक्षक कार्यालय गये और वहाँ पर घटना का प्रार्थना पत्र भी दिये परन्तु कोई कार्यवाही नही हुई।
      दिनांक 23 जुलाई, 2014 को पुनः समय लगभग 10:00 बजे सुबह 8 गाड़ी पुलिस वाले आये। जिसमें वन विभाग के वन रेन्जर जगदीश कुमार, वन दरोगा संजय दुबे, विनोद यादव व गाँव के दबंग ओम प्रकाश यादव, इन्द्र बहादुर सिंह अपने साथ टैक्टर और आदमी लेकर आये जो हम लोगों को बहुत ही बेरहमी से जानवरों की तरह मार रहे थे। उन लोगों ने औरतों और बच्चियों को भी नही छोड़ा। चारों तरफ बचाओं-बचाओं की चीख पुकार निकल रही थी। हम लोग दर्द से कराह रहे थे। परन्तु हम लोगों का कोई पीड़ा सुनने वाला नही था। हम लोगों के घर में रखा समान को दबंगो ने तोड़ डाला और हम लोगों के बच्चियाँ और महिलाओं के साथ जोर जबरदस्ती भी किये। हमारे घर का सामान अनाज बकरा-2, बकरी-3, मुर्गी-मुर्गा-15, कपडा, 5000 रुपये सब उठा ले गये। हम लोग खुन से लगभग जिला अस्पताल लोढी में अपना और बच्चियाँ को इलाज कराने तथा मेेड़िकल बनवाने गये तो डॉक्टर बोले की मेड़िकल का 500 रुपये दोगे तो मेड़िकल बनाये नही तो मेड़िकल नही बनायेगें। हम लोग डॉक्टर के सामने बहुत गिड़ गिड़ाये की साहब वन विभाग के पुलिस प्रशासन दबंग लोगों ने हम लोगों को मारा-पिटा सब रुपया पैसा सब उठा ले गये। हम लोग पैसा कहाँ से लायेगें। परन्तु डॉक्टर ने हम लोगों का एक नही सुना और बिना पैसे के मेडिकल नही बनाये। हम लोग अपना रिपोर्ट लिखवाने सीधे पुलिस अधीक्षक कार्यालय चुर्क गये। वहाँ पर पहले से चैकी इन्चार्ज हम लोगों को माँ-बहन की भद्दी-भद्दी जाति सूचक गाली देकर भगा दिये और केाई सुनवायी नही हुयी। अब हम लोगों को हमेशा डर बना रहता कि हमारे समुदाय के लोगों का क्या होगा। जब हमलोगों के आँखो के सामने औरतो और बच्चियाँ को मारा-पिटा जाता है और जबरदस्ती किया जा रहा है तो न रहने पर बलात्कार, हत्या व जाने से व मार दे। इसी बात की चिन्ता के मारे हम लोग कही काम पर भी नही जा रहे है। मैं समझता हूँ कि आज के समाज में जब अधिकारी बीक चुके है। क्यों की प्रशासन, कानून तथा डाॅक्टर का कर्तव्य होता है लोगों का मदद करना लेकिन वो लोग उल्टा रक्षक न बनकर भच्छक बन गये। अगर यही रवैया रहा तो गरीब जनता का क्या हाल होगा लोगों का जीना दुश्वार हो जायेगा। आज हम लोगों के पास पैसा, रुपया आनाज तथा कमाने का सब साधन उठा ले गये। आज हम लोगों पर भुखमरी के कगार पर है। उन दबंगों व विरोधियों से हमेशा डर बना रहता है। जब-जब समुदाय में ऐसी घटना घटी तब-तब हम लोग भिख मांगने के कगार पर आ गये। आज हमारी कौन अल्ला-ताला से फरियाद करते है कि अब इस तरह का सजा दुश्मनों के साथ सपनों में भी न हो। 
     हमें अपनी बात बताकर कुछ हल्का पन महसुस हो रहा है कि अब हम लोगों को इन्साफ मिलेगा। मैं आप लोगों का जीवन भर अभारी रहुगां।


 साक्षात्कारकर्ता -पिन्टू गुप्ता  व महेश गुप्ता           
 संघर्षरत पीड़ित- अब्दुल रहीस खान                                          

                                






Friday, 17 April 2015

‘आंखों के सामने सब कुछ होता देख मन को बहुत दुःख हुआ’’

              मेरा नाम बनारसी लाल उम्र-60 वर्ष हैं। मेरे पिता स्व0 श्री बंगाली दास है। मेरी पत्नी फुलभारी देवी हैं। मेरे चार लड़के तीन लड़कियां हैं। विमल कुमार-32 वर्ष का है जो कि शादीशुदा है, और वह खराद का काम करता है। निर्मल चन्द जो कि मजदूरी करता है। मंजीत कुमार और संजीत हाईस्कूल पास है। दो लडकियां विवाहित है और छोटी लड़की कुमारी अनीता अविवाहित है। मैं राजगीर का काम करता हूँ।
मैं ग्राम-भीटा,पोस्ट-भीटा,थाना-घुरपुर, ब्लाक-जसरा, तहसील-बारा, जिला-इलाहाबाद का निवासी हूँ। 14 जुलाई, 2012 शनिवार की घटना से मेरी अधिक नुकसान हुआ। उस जमीन में मेरे लडके के नाम से पट्टा था। वहाँ कच्ची मिट्टी से 32 से 34 फीट का कमरा बनाकर टीन छाकर 8 फीट ऊँचाई का दरवाजा लगाकर उसमें सारा सामान गल्ला, सरिया, बालु, चिमटा, गद्दा, रजाई, सब कुछ रखा था। पत्थर बाधकर सरिया का पिलर देकर लिन्टर से बुनियाद बनाया था। सब कुछ उजाड़ दिया। यह कहकर चुप हो गये। क्या करुँ इस महँगाई में एक-एक सामान इकट्ठा कर रहा था कि घर बनवाऊॅगा लेकिन उस दिन उन लोगों ने मेरी मेहनत को खत्म कर दिया। जब बस्ती उजड़ रही थी तब मैं घटना स्थल पर नही था, औरत और मझला बेटी वहीं था। जब मुझे उसकी खबर मिली तो मैं दौड़ा भागा आया। देखा कि सारी जमीन पर पाल के लोग हसुआ लाठी के सहारे से सारा सामान ले जा रहे थे। मैं मजबूर खड़ा उनको ऐसा करते देख रहा था। क्या करता अगर कुछ कहते तो सामान का नुकसान होता और मुझे भी मार गिराते। बढ़ती उम्र में हाथ पाव तोड़वाकर बैठ जाता तो मेरे परिवार का क्या होता। उन्हें ऐसा करता देख मेरे मन को बहुत दुःख तो हो रहा था। लेकिन मैं बेवस था। उस वक्त मैं बहुत तफलीफ से गुजर रहा था। दो वक्त की रोटी जुटाना इस महगांई में मुश्किल हैं। सब कुछ ऐसा लग रहा था कि मेरा सब कुछ खत्म हो रहा हैं। हमें तमाशगीन बने देख रहा था। उन लोगों ने मिट्टी तक नही छोड़ा।
मैं वही था तभी पुलिस की गाड़ी आयी उनको यह कहते हुए मैंने सुना मैं दोबारा आऊ तो कोई भी निशान यहाँ न रहे जल्दी-जल्दी सब साफ करों। उस समय यह सुनकर मैं बहुत दुःखी हुआ, कि इनको हमारी रक्षा करने के बजाय वह उन्हीं का साथ दे रहे हैं। यही सब सुनकर मैं थाने नही गया। बस्ती की महिलायें जिन्हें चोट लगा था। कुछ आदमियों के साथ थाने गयी। वहा उनके साथ बुरा सलूख किया गया। दो लोगों को तो थाने में बन्द कर दिया गया। मैं थाने के बाहर ही कुछ दूर पर था। मैं अन्दर जाकर भी कुछ नही कर सकता था। क्योंकि पुलिस खुद उन आरोपियों का साथ दे रही थी। कुछ देर बीतने के बाद मेरा मन नहीं माना मैं भी थाने अपनी शिकायत लेकर गया तो वही हुआ जिसका अन्दाजा मुझे था। थाने में हमारी शिकायत नही सुनी गयी। पुलिस वालों ने उन लोगों से पैसा ले रखे थे। यह सब देख-देख कर मेरा मन बहुत दुःखी हो रहा था। हम गरीबों की तो कोई सुनवाई ही नही होती है। अब इस घटना से हम लोगों को पूरी तरह तोड़ दिया हैं। अब हमेशा डर बना रहता है। थाने में सुनवाई न होने पर हम लोगों ने तीन दिन के बाद कचहरी में केस दर्ज किया। वहाँ की तारीख लगती है। अभी तक वहाँ से भी न्याय नही मिला इसी चिन्ता में रात को नींद नही आती, मन अशान्त सा रहता है। मेरा तो बीत गया लेकिन बच्चों का फिक्र खाये जा रहा हैं। अगर यह लोग ऐसे ही दबंगई करते रहे तो हमारी चिन्ता और बढ़ जायेगी। थाने से भी कोई मदद मिलने की उम्मीद नही हैं।
उस घटना को याद करता हूँ तो बहुत गुस्सा आता है। मैं चाहता हूँ कि जिन लोगों ने हमारी जमीन पर कब्जा किया है। हमारा सब कुछ लूट ले गये, उनके खिलाफ सख्त से सख्त कार्यवाही हो और मुझे न्याय मिले। आप से मिलकर आपको अपनी बात बताकर मेरा मन हल्का हुआ हैं।

         साक्षात्कारकर्ता                                  संघर्षरत पीड़ित

         ( फरहत शबा खानम्)                             (बनारसी लाल)