Tuesday, 21 April 2015

अपनी किस्मत पर रोऊँ या बेटी के !

       किसी माँ की बेटिय दहेज की बली चढ़ने के लिए पर गुजरती रहेगी उन्हे दहेज के नाम पर ससुरल मे कब तक सताई व मारी जाइ गी ऐसी ही कहानी एक गरीब माँ की जुबानी !
मेरा नाम सोम्मर है मेरी उम्र 50 वर्ष है मेरे पति प्रकाश है, मै ग्राम-बहेरा, थाना-करमा, ब्लाक-करमा जिला-सोनभद्र की रहने वाली हूँ। मेरी दो लडकियाँ व एक लडका है सभी विवाहित है। हम लोग बनी मजदुरी कर अपना जीवन गुजार एक लडके व लडकी की शादी की इसके बाद कोई चिन्ता नही थी, लेकिन बेटी मालती की शादी के बाद ससुराल वालो द्वारा पैसा माँगना तथा बेटी के ऊपर अत्याचार किये जाने के कारण मन बहुत दुःखी रहता है।
        21 जून, 2012 को कन्हैया पुत्र इन्द्रबहादुर ग्राम-करकीमैना, थाना-करमा, जिला-सोनभद्र में शादी किया। उस समय लगा कि अब सब जिम्मेदारी से मुक्ति मिल गयी। बड़ी बेटी और दामाद ने अच्छा घर-बार देखकर यह रिस्ता बताया था। लेकिन धीरे-धीरे यह सब भ्रम खत्म होता दिख रहा था। एक दिन मेरी बेटी का फोन आया, मेरी बेटी ने रो-रोकर अपने साथ हुये अत्याचार के बारे में बताया। यह सुनकर मैं घबरा गयी और कुछ पैसों का इन्तजाम कर उसे लेने चली गयी। बेटी की मा होने के कारण उसके ससुराल में कुछ नहीं बोला और बेटी को लेकर वापस अपने घर आ गयी। उसकी हालत देखकर मै बहुत दुःखी हो गयी उससे चला नहीं जा रहा था और वह रोने लगी। वह भी मुझे देखकर रो रही थी। घर पर जो कुछ घरेलु हल्दी-प्याज था उसको लगाकर बांध दी फिर कुछ पैसे का इन्तजाम कर उसे दवा दिलाने ले गयी। वह अपने मुह से कुछ नहीं कह पा रही थी लेकिन उसकी हालत देखकर मुझे बहुत तकलीफ हो रहा था हमे चिन्ता हो रही थी कि क्या बात हैं कि उन लोगों ने इतना बुरा हाल कर दिया हैं। 
       लेकिन गरीबी और जानकारी न होने के कारण चुपचाप बैठ गयी, लेकिन मन दिन-रात परेशान रहने लगा। कुछ दिन बाद धीरे-धीरे बेटी की भी तबीयत सुधर गयी। वह भी बाहर व अन्दर के कामो में मदद करने लगी। लेकिन मेरा मन बार-बार उसके तरफ ही जाता। तभी एक दिन उसके ससुराल वालो का फोन आया कि दशहरा बाद विदाई कराने आयेगें तो मै बोली कि कुछ दिन और रूक जाइए। तब यह बोले कि अगर बाद में विदाई देगे तो टी0वी0 और पंखा सब कुछ देना होगा। गरीब के कारण जो कुछ भी शादी में अपनी हैसियत से अधिक दे चुकी थी। मै बोली अगर बाद में विदाई करूगी तो कहा से इन्तजाम कर करूगी तो मैने सोचा कि उनकी के तारीख पर रखकर विदाई कर दिया। अभी बेटी को ससुराल गये 3-4 दिन ही हुए थे कि फिर फोन आया कि दहेज न मिलने के कारण जलाने की धमकी दी जा रही है। और भाग जाने के लिए कह रहे है। यह सुनकर फिर भागी परायी उसे लेने आयी। गरीबी इंसान को बेवस व लाचार बना देती हैं। हम चुपचाप अपनी बेटी को लेकर चली आयी। उस दिन तो ऐसा लग रहा था कि कहा मैने उसकी शादी कर दी। यह सब देखकर समझ में नही आ रहा था कि क्या करू किससे क्या कहॅू। अपनी किस्मत पे रोऊॅ या बेटी के। चुपचाप मजदूरी में लग गयी। काम करती थी लेकिन दिमाक हमेंशा बेटी के तरह ही रहता। भगवान यह मेरी बेटी के साथ ही क्यों हुआ। वह भी चुपचाप रहने लगी। इन्ही की चिन्ता से मेरी बड़ी बेटी भी दुबली व कमजोर हो गयी। खाने-पीने का कुछ भी मन नहीं करता। आज पड़ोस में भी जाना मना हो गया। रात को सोती हॅू तो उसी की चिन्ता बनी रहती है। उन दिन के बाद से आज तक उसे ससुराल वालों ने कोई खबर नहीं ली। मेरी बड़ी बेटी जब जाती है तो मेरी समधन उससे बात तक नहीं करती है। इस कारण मन में हमेशा डर रहता है कि कहीं यह लोग इसकी शादी की तैयारी तो नही कर रहे है। मेरी बेटी उसी के साथ जाना चाहती हैं। वह बोलती हैं। माँ शादी एक बार होती है। मै चाहती हूँ कि अगर वह मेरी बेटी के साथ अन्याय न करे उसे अच्छे से रखे तो आकर वह विदाई कराके ले जाये।
       मै चाहती हूँ कि लड़का पक्ष वाले कहे और हमारी बात सुन किसी सही निर्णय पर पहूँच कर बेटी की भविष्य को ध्यान में रखकर उचित निर्णय ले। उसके साथ किसी भी तरह का शारीरिक एवं मानसिक यातना न दिया जाय। तब मैं उसके ससुराल वालों के साथ बेटी को बिदाई के लिए तैयार हूँ।
  साक्षात्कारकर्ता                                      संघर्षरत पीड़िता
      पिन्टू गुप्ता                                         सोम्मर

Monday, 20 April 2015

हिन्दुस्तान में हम मुस्लिम को क्यों जीने का अधिकार नही क्यों जूर्म कर रहे है। पुलिस प्रशासन वन विभाग दबंग और स्वस्थ्य विभाग!

मेंरा नाम अब्दुल रहीस खान उम्र-32 पुत्र-सजब खान जाति मुस्लिम हूँ। ग्रामवपोस्ट-चुर्क,चैकी-चुर्क,कोतवाली- राबर्ट्सगंज ,तहसील-राबर्ट्सगंज-जिला-सोनभद्र का निवासी हूँ। मेरे पास कोई लड़का लड़की नही हमारे बस्ती में 30-35 घर है। जिसकी आबादी लगभग सौ से ढेड सौ है। हम गरीब लोग मेहनत मजदूरी करके अपने परिवार भरण-पोषण करते है।
घटना दिनांक 5 फरवरी, 2014 की रात समय लगभग 08:00 बजे अचानक हमारे घर 5-6 गाड़ी फोर्स आयी जिसमें वन रेंजर जगदीश कुमार वन दरोगा संजय दुबे बबुआ यादव पुलिस विभाग दरोगा विनोद यादव पुलिस चैकी की अन्य पुलिस हमारे बस्ती में आये। हमारे समुदाय के बच्चें महिलाओं और पुरुषों को बड़ी बेरहमी से डंडा, थप्पड़, लातो से शरीर के सभी अंगो पर मरने लगे। जिससे चारों तरफ हाहाकार मच गया, चारों तरफ बचाओं-बचाओं की चीख पुकार निकल रही थी। चारों तरफ खून ही खून बह रहा था। जिधर देखो रोने चिल्लाने की आवाज आ रही थी। हम लोगों ने वहाँ पर अधिकारियों से पुछ रहे थे कि साहब हम लोग गरीब को अनानास किस जूर्म के लिए मारा जा रहा है। हम लोग यहाँ पर करीब 30-35 वर्षों से यही पर रह रहे है। इस तरह की घटना पहले कभी नही हुई उसी समय बस्ती के दबंग ओम प्रकाश यादव व इन्द्र बहादुर सिंह अपने आदमियों के साथ आये और बोले की मारों सालों मुसलमानों को उनके आदमियों ने प्रशासन के साथ मिलकर मारना शुरु कर दिये साथ ही साथ हम लोगों का कच्चा मकान तोड़ना शुरु कर दिये। जब हमारी बच्चियाँ और बस्ती के औरतो ने इसका विरोध किया तो उन लोगों खुलेआम जल्लादो की तरह महिलाओं और बच्चियों के साथ जोर जबरजस्ती करने लगे। हमलोग बच्चियाँ और महिलाओं को बचाने का प्रयास कर रहे थे। लेकिन विरोधियों की संख्या के आगे हम लोगों कुछ नही कर पाये। महिलाओं और बच्चियाँ रो-रोकर अधिकारियों और अल्हा ताला से मदद की गुहार लगा रही थी, लेकिन उन लोगों का पीड़ा सुनने वाला कोई नही था। जब विरोधी ने हम लोगों का मकान साथ हो टिनसिट तोड़ना शुरु किये तो लग रहा था की हम लोगों का पुरी-पुरी दुनियां ही उजड़ गयी है। हमारे घर का पुरा सामान अनाज बकरा-बकरी, मुर्गा-मुर्गी कपड़ा तथा नगद 5000/- रुपये सब उठा ले गये। उस समय विरोधियों की लगभग 70-80 की संख्या में थे जो फर्शा, कुल्हाडी, गैता, सब्बल से लोग मेरा घर तोड़ रहे थे।
दबंग ओम प्रकाश यादव, इन्द्र बहादुर सिंह के आदमी एक टैक्टर में लाठी-डण्डे से मौजूद थे। जिनके आगे हम लोगों के मुह से आवाज नही निकल रहा था वो लोग हम लोगों के बच्चियाँ के साथ जबरदस्ती छेडछाड़ करने लगे। उस समय हम लोगों को ऐसा महसुस हो रहा था कि अल्ला हमलोगों को किस गलती की सजा दे रहा है। वहाँ पर किसी को हम लोगों पर दया नही आ रही थी। हम लोगों के आँखों से आँसु ऐसे बह रहा था कि रुकने का नाम नही ले रहा था। हम लोगों का जो सामान लुटे थे वे सब बस्ती के अन्य बिरादरी (हिन्दु धर्म) के लोगों में बाँट दिये।
दिनांक 26 फरवरी, 2014 समय लगभग 10:00 बजे सुबह पर मैं अपनी बच्चियाँ और अन्य पीड़ित/पीड़िता के साथ जिला अस्पताल लोढी सोनभद्र में अपने इलाज और मेड़िकल बनवाने गये। वहाँ पर न तो मेरा इलाज हुआ और न ही परिवार के लोगों का हास्पितल पर पहले से पुलिस वाले मौजुद थे। फिर हम लोग पुलिस अधीक्षक कार्यालय गये और वहाँ पर घटना का प्रार्थना पत्र भी दिये परन्तु कोई कार्यवाही नही हुई।
      दिनांक 23 जुलाई, 2014 को पुनः समय लगभग 10:00 बजे सुबह 8 गाड़ी पुलिस वाले आये। जिसमें वन विभाग के वन रेन्जर जगदीश कुमार, वन दरोगा संजय दुबे, विनोद यादव व गाँव के दबंग ओम प्रकाश यादव, इन्द्र बहादुर सिंह अपने साथ टैक्टर और आदमी लेकर आये जो हम लोगों को बहुत ही बेरहमी से जानवरों की तरह मार रहे थे। उन लोगों ने औरतों और बच्चियों को भी नही छोड़ा। चारों तरफ बचाओं-बचाओं की चीख पुकार निकल रही थी। हम लोग दर्द से कराह रहे थे। परन्तु हम लोगों का कोई पीड़ा सुनने वाला नही था। हम लोगों के घर में रखा समान को दबंगो ने तोड़ डाला और हम लोगों के बच्चियाँ और महिलाओं के साथ जोर जबरदस्ती भी किये। हमारे घर का सामान अनाज बकरा-2, बकरी-3, मुर्गी-मुर्गा-15, कपडा, 5000 रुपये सब उठा ले गये। हम लोग खुन से लगभग जिला अस्पताल लोढी में अपना और बच्चियाँ को इलाज कराने तथा मेेड़िकल बनवाने गये तो डॉक्टर बोले की मेड़िकल का 500 रुपये दोगे तो मेड़िकल बनाये नही तो मेड़िकल नही बनायेगें। हम लोग डॉक्टर के सामने बहुत गिड़ गिड़ाये की साहब वन विभाग के पुलिस प्रशासन दबंग लोगों ने हम लोगों को मारा-पिटा सब रुपया पैसा सब उठा ले गये। हम लोग पैसा कहाँ से लायेगें। परन्तु डॉक्टर ने हम लोगों का एक नही सुना और बिना पैसे के मेडिकल नही बनाये। हम लोग अपना रिपोर्ट लिखवाने सीधे पुलिस अधीक्षक कार्यालय चुर्क गये। वहाँ पर पहले से चैकी इन्चार्ज हम लोगों को माँ-बहन की भद्दी-भद्दी जाति सूचक गाली देकर भगा दिये और केाई सुनवायी नही हुयी। अब हम लोगों को हमेशा डर बना रहता कि हमारे समुदाय के लोगों का क्या होगा। जब हमलोगों के आँखो के सामने औरतो और बच्चियाँ को मारा-पिटा जाता है और जबरदस्ती किया जा रहा है तो न रहने पर बलात्कार, हत्या व जाने से व मार दे। इसी बात की चिन्ता के मारे हम लोग कही काम पर भी नही जा रहे है। मैं समझता हूँ कि आज के समाज में जब अधिकारी बीक चुके है। क्यों की प्रशासन, कानून तथा डाॅक्टर का कर्तव्य होता है लोगों का मदद करना लेकिन वो लोग उल्टा रक्षक न बनकर भच्छक बन गये। अगर यही रवैया रहा तो गरीब जनता का क्या हाल होगा लोगों का जीना दुश्वार हो जायेगा। आज हम लोगों के पास पैसा, रुपया आनाज तथा कमाने का सब साधन उठा ले गये। आज हम लोगों पर भुखमरी के कगार पर है। उन दबंगों व विरोधियों से हमेशा डर बना रहता है। जब-जब समुदाय में ऐसी घटना घटी तब-तब हम लोग भिख मांगने के कगार पर आ गये। आज हमारी कौन अल्ला-ताला से फरियाद करते है कि अब इस तरह का सजा दुश्मनों के साथ सपनों में भी न हो। 
     हमें अपनी बात बताकर कुछ हल्का पन महसुस हो रहा है कि अब हम लोगों को इन्साफ मिलेगा। मैं आप लोगों का जीवन भर अभारी रहुगां।


 साक्षात्कारकर्ता -पिन्टू गुप्ता  व महेश गुप्ता           
 संघर्षरत पीड़ित- अब्दुल रहीस खान                                          

                                






Friday, 17 April 2015

‘आंखों के सामने सब कुछ होता देख मन को बहुत दुःख हुआ’’

              मेरा नाम बनारसी लाल उम्र-60 वर्ष हैं। मेरे पिता स्व0 श्री बंगाली दास है। मेरी पत्नी फुलभारी देवी हैं। मेरे चार लड़के तीन लड़कियां हैं। विमल कुमार-32 वर्ष का है जो कि शादीशुदा है, और वह खराद का काम करता है। निर्मल चन्द जो कि मजदूरी करता है। मंजीत कुमार और संजीत हाईस्कूल पास है। दो लडकियां विवाहित है और छोटी लड़की कुमारी अनीता अविवाहित है। मैं राजगीर का काम करता हूँ।
मैं ग्राम-भीटा,पोस्ट-भीटा,थाना-घुरपुर, ब्लाक-जसरा, तहसील-बारा, जिला-इलाहाबाद का निवासी हूँ। 14 जुलाई, 2012 शनिवार की घटना से मेरी अधिक नुकसान हुआ। उस जमीन में मेरे लडके के नाम से पट्टा था। वहाँ कच्ची मिट्टी से 32 से 34 फीट का कमरा बनाकर टीन छाकर 8 फीट ऊँचाई का दरवाजा लगाकर उसमें सारा सामान गल्ला, सरिया, बालु, चिमटा, गद्दा, रजाई, सब कुछ रखा था। पत्थर बाधकर सरिया का पिलर देकर लिन्टर से बुनियाद बनाया था। सब कुछ उजाड़ दिया। यह कहकर चुप हो गये। क्या करुँ इस महँगाई में एक-एक सामान इकट्ठा कर रहा था कि घर बनवाऊॅगा लेकिन उस दिन उन लोगों ने मेरी मेहनत को खत्म कर दिया। जब बस्ती उजड़ रही थी तब मैं घटना स्थल पर नही था, औरत और मझला बेटी वहीं था। जब मुझे उसकी खबर मिली तो मैं दौड़ा भागा आया। देखा कि सारी जमीन पर पाल के लोग हसुआ लाठी के सहारे से सारा सामान ले जा रहे थे। मैं मजबूर खड़ा उनको ऐसा करते देख रहा था। क्या करता अगर कुछ कहते तो सामान का नुकसान होता और मुझे भी मार गिराते। बढ़ती उम्र में हाथ पाव तोड़वाकर बैठ जाता तो मेरे परिवार का क्या होता। उन्हें ऐसा करता देख मेरे मन को बहुत दुःख तो हो रहा था। लेकिन मैं बेवस था। उस वक्त मैं बहुत तफलीफ से गुजर रहा था। दो वक्त की रोटी जुटाना इस महगांई में मुश्किल हैं। सब कुछ ऐसा लग रहा था कि मेरा सब कुछ खत्म हो रहा हैं। हमें तमाशगीन बने देख रहा था। उन लोगों ने मिट्टी तक नही छोड़ा।
मैं वही था तभी पुलिस की गाड़ी आयी उनको यह कहते हुए मैंने सुना मैं दोबारा आऊ तो कोई भी निशान यहाँ न रहे जल्दी-जल्दी सब साफ करों। उस समय यह सुनकर मैं बहुत दुःखी हुआ, कि इनको हमारी रक्षा करने के बजाय वह उन्हीं का साथ दे रहे हैं। यही सब सुनकर मैं थाने नही गया। बस्ती की महिलायें जिन्हें चोट लगा था। कुछ आदमियों के साथ थाने गयी। वहा उनके साथ बुरा सलूख किया गया। दो लोगों को तो थाने में बन्द कर दिया गया। मैं थाने के बाहर ही कुछ दूर पर था। मैं अन्दर जाकर भी कुछ नही कर सकता था। क्योंकि पुलिस खुद उन आरोपियों का साथ दे रही थी। कुछ देर बीतने के बाद मेरा मन नहीं माना मैं भी थाने अपनी शिकायत लेकर गया तो वही हुआ जिसका अन्दाजा मुझे था। थाने में हमारी शिकायत नही सुनी गयी। पुलिस वालों ने उन लोगों से पैसा ले रखे थे। यह सब देख-देख कर मेरा मन बहुत दुःखी हो रहा था। हम गरीबों की तो कोई सुनवाई ही नही होती है। अब इस घटना से हम लोगों को पूरी तरह तोड़ दिया हैं। अब हमेशा डर बना रहता है। थाने में सुनवाई न होने पर हम लोगों ने तीन दिन के बाद कचहरी में केस दर्ज किया। वहाँ की तारीख लगती है। अभी तक वहाँ से भी न्याय नही मिला इसी चिन्ता में रात को नींद नही आती, मन अशान्त सा रहता है। मेरा तो बीत गया लेकिन बच्चों का फिक्र खाये जा रहा हैं। अगर यह लोग ऐसे ही दबंगई करते रहे तो हमारी चिन्ता और बढ़ जायेगी। थाने से भी कोई मदद मिलने की उम्मीद नही हैं।
उस घटना को याद करता हूँ तो बहुत गुस्सा आता है। मैं चाहता हूँ कि जिन लोगों ने हमारी जमीन पर कब्जा किया है। हमारा सब कुछ लूट ले गये, उनके खिलाफ सख्त से सख्त कार्यवाही हो और मुझे न्याय मिले। आप से मिलकर आपको अपनी बात बताकर मेरा मन हल्का हुआ हैं।

         साक्षात्कारकर्ता                                  संघर्षरत पीड़ित

         ( फरहत शबा खानम्)                             (बनारसी लाल)






Saturday, 28 March 2015

गरीब असहाय लड़की के ऊपर तेजाब फेककर जान से मारने की कोशिश!

आज भी हमारे भारत देश में इन्सानियत को तार-तार करते हुए जीवन भर के बन्धन को तार-तार करते हुए असहाय लड़की को बार-बार प्रताडि़त करने व उसके ऊपर ज्वलन पदार्थ फेकने का शौक रखते है। उनको मानो रिस्ते का व्यापार करने में व यातना देने में सुख की अनुभव करते है। वे कानून को खिलौना समझते है। 
                      आइये ऐसी ही घटना पीडि़त की जुबानी सुने।
मेरा नाम अराधना उर्फ पूजा मुसहर उम्र 25 वर्ष मेरे पिता का नाम सन्त राम मुसहर मेरे परिवार में तीन भाई और दो बहन है। जो ग्राम-चकन्दर पुर (बसनी दल्लूपुर), थाना-फूलपुर, ब्लाक-बड़ागाँव, जिला-वाराणसी रहने वाली हूँ। मेरी शादी दिनांक 6 जून, 2009 में विनोद मुसहर पुत्र वोघई ग्राम-आलम खातूनपुर, थाना-धीना, जिला-चन्दौली के साथ पुरे रीति-रिवाज के साथ की गयी थी जिसमें मेरे पिता सन्तराम मुसहर द्वारा शादी में हण्डा, परात, साईकिल, घड़ी, रेडि़यों किसी प्रकार कर्ज लेकर दिये थे। मेरे पति व मेरे बस्ती के लोग हमारे गाँव के दबंग व्यक्ति ठाकुर रणविजय सिंह के राईस मिल पर व उसके खेत में काम करते है। जिनकी मजदूरी उन्हें महीने में 1000 रुपयें के दर से दिया जाता है।  
मेरे ससुराल के सभी परिवार एक ही में रहते है। ससुराल में जाने के बाद मैं दूसरे दिन सुबह उठी तो घर के लोग मजदूरी करने ठाकुर के खेत में चले गये, मैं घर का काम करके खाना बनाने लगी जब शाम को सभी लोग घर आये तो मै उन्हे खाना खाने के लिए बोली सभी मुझसे मूँह मोड़ते हुए कहाँ कि 12:00 बजे सोके उठी हो हम लोगो को काम पर नहीं जाना था। दुसरे दिन से मैं भोर में तीन बजे उठ जाती थी और खाना बनाती फिर परिवार को खिला-पीलाकर उनके साथ काम पर चली जाती थी। एक महीने तक इसी प्रकार घर व खेत में काम करती रही खाने को जो भी रूखा-सुखा मिलता था मैं किसी से नहीं कहती कभी-कभी भूखो सो जाती थी। उस समय माता-पिता की बहुत याद आती थी लगता था मै विल्कुल अकेली हूँ। इस दुनिया में मेरा कोई नही है। ऊपर से मेरी सास लाच्छन लगाती थी कि तीन बच्चा गिराकर मेरे बेटे के साथ आयी थी। उसका जीवन खराब करने उनकी बात सूनकर मेरा पूरा शरीर कापने लगा मै फूट-फूट कर रोने लगी। फिर भी मैं कुछ नहीं बोलती पूरे गम को अपने आँचल में छिपाकर कर रखती रही। जब मेरे माता-पिता गये तो लोग उनके साथ मेरी विदाई कर दिये मै अपने पिता के साथ बसनी आ गयी मै अपने ऊपर आप बीती घटना को अपने माता-पिता से नहीं बताई कि वे सुनेगे तो उन्हें तकलीफ होगी|
 मेरे माता-पिता एक महीने बाद मेरी विदाई कर दिये जब मै वहाँ गयी तो लोगों की वही रवैइया (व्यवहार) रहा वहाँ मेरी सास, ससुर, ननद, सुभावती व मेरे पति विनोद मुसहर गाली देते थे कि तुम्हारे पिता शादी में कुछ भी नहीं दिये यही ताना मारकर रोज मारते-पीटते गाली देते थे, मै सब कुछ वरदास करती रही बीच में मेरा बड़ा लड़का उस समय चार वर्ष का था और छोटा बच्चा 18 माह का मैं कभी-कभी सोचती थी। कि कही जाकर अपनी जान दे दूँगी लेकिन बच्चों का मुह देखकर दया आ जाती थी उनको ही अपना जीवन का आधार मानकर जीती रही। ससुराल वालो के द्वारा जोर जुर्म को सहती रही अपने माइके भी मै अपने दुःखो का वया नहीं करती थी कि लोग परेशान हो जायेगे। मेरे ऊपर जो दु:ख पड़ता है। मै? खुद सह लूगी कभी-कभी रोते विलखते सुवह हो जाता, बिना खाये पीये लेकिन बच्चों को देखकर अपने आपको को मना लेती एक दिन मेरे पति के साथ मेरे परिवार वाले मानवता व इंसानियत को ताख पर रखते हुए सुबह 6:00 बजे शुक्रवार के दिन सभी लोग पकड़कर मारने लगे उस समय मै जोर-जोर से रो-रोकर चिल्ला रही थी कि कोई छुड़ाने नहीं आया मेरा बच्चा मेरी गोद में था मै दर्द से विलखती व रोती रही। इतने से भी लोगो का कलेजा नहीं भरा मेरे ऊपर गैलन में भरी तेजाब कमर के नीचे फेके मै इतना दु:ख नहीं सह पा रही थी| तेजाब मेरे बच्चे के कमर पर भी पडा वह भी छटपटाने लगा रोने-चिल्लाने लगा। मुझसे वर्दाश नहीं हो पा रहा था तो मै। दौड़ते भागते हुए अपनी जान बचाने के लिए धीना थाने पर गयी मौके पर पुलिस आई तो ठाकुर के कहने व वहकावे में आकर सुलह करते हुए सबको छोड दी।
मै तड़फ रही थी दर्द वरदास नहीं हो रहा था मुझे न मेरे बच्चे को कोई दवा भी नहीं दिलाया। दुसरे दिन मेरे जेठ सन्तोष मुसहर मेरे पिता को मोबाइल से फोन करके बताया कि आपकी लड़की हास्पिटल मे भर्ती है। उसका मुह देखना हो तो चले आइये मरे माता-पिता मेरा सन्देश सुनकर रोते-विलखते मेरे ससुराल पहूचे वहा मेरी दशा देखकर आवाक हो गये उनकी आँखो से आसू देखकर मै और जोर-जोर से रोने लगी मुझसे चला नही जा रहा था। मेरे पिता किसी प्रकार से वहा से बसनी लाये पैसे के आभाव में दवा भी नहीं हो पाया रहा था। मै चारपाई पर ही पड़ी रहती थी। उस समय केवल मृत्यु नहीं हुई लेकिन सब दर्द का एहशास हो गया। इसी बीच मानवाधिकार कार्यकर्ता दिनेश कुमार आये और हम लोगों को मानवधिकार जननिगरानी समिति दौलतपुर वाराणसी लाये वहा से संस्था के द्वारा हमें व हमारे बच्चे को कबीर चैरा हास्पिटल में भर्ती कराया गया। मै हास्पिटल में काफी दिन तक रही वहा दवा का सारा खर्च व देख-रेख मानवाधिकार कार्यालय के  कार्यकर्ता द्वारा किया जा रहा था। उस समय मुझे लगा कि आज की दुनिया में गरीवों की दुःखो को सुनने वाले कुछ लोग हे। उन लोगों को देखकर मै बहुत रोती थी वे बार-बार मुझे समझाते थे। आज भी मै घटना के बारे में सोचती हू। तो पूरे शरीर में आग सी लग जाती है। पुरे रोगटे खडे हो जाते है। मेरा पुरा शरीर कापने लगता है। मन घवराने लगता है। रात में डरावना सपना दिखाई देता है। रात में नींद नहीं आती सर दूखने लगता है। मै इस समय अपने पिता के पास बसनी रहती हूँ।
 अब मै उस घर में कभी नही जाऊॅगी अब मै चाहती हू कि एैसे पापी के खिलाफ कानूनी कार्यवाही हो ताकि ऐसी हालत किसी और के साथ न हो सके। आपको अपनी बातों को बताकर मन हल्कापन महसूस कर रही हूँ।
संघर्षरत पीडि़ता-  अराधना                                            
साक्षात्कारकर्ता - छाया कुमारी           

Friday, 27 March 2015

पुलिस की लापरवाही से दबंग व्यक्तियों द्वारा मुसहर के ऊपर किया गया अत्याचार!

आज भी हमारे भारत देश में पुलिस की गुण्ड़ा गर्दी से दबंग व्यक्ति के मनोबल को प्रोत्साहन करने का ठेका ले रखी है भारत के संविधान को खिलौना समझते हुए, गरीब व्यक्ति की स्व व्यथा कथा उनकी जुबानी सुने।
मेरा नाम मुरली मुसहर उम्र 35 वर्ष मेरे पिता का नाम बुझन्न मुसहर ग्राम-थानेरामपुर पो0 थानेरामपुर, थाना-फुलपुर, जिला-वाराणसी का मूल निवासी हूँ। मेरे परिवार में मै व मेरी पत्नी व बच्चें रहते है। मै गरीब असहाय बेरोजगार जाति का मुसहर हुँ और किसी प्रकार मजदुरी करके अपना व अपने परिवार का पेट पालते हुए खुशी पूर्वक रहता था। हम लोग आपस में मिल-जुल कर रहते थे। हमारे घर का घरेलु सामान खत्म हो जाने पर मेरी पत्नी ने सुबह कहा कि आज घर में कुछ भी सामान नही है जाओं दुकान से कुछ सामान लेकर आओं हम लोग बना-खाकर काम पर चलते है जब मै पैसा लेकर मीराशाह मडियाहूँ वाले रोड़ पर किराना के दुकान पर पहुँचा ही था कि विकाश सिंह, दिलिप सिंह हमको भद्दी-भद्दी गाली देते हुए मारने लगे और कहने लेगे कि यही हमारे खेत में पानी खोला है यह बात सुनकर जब मैं बोल रहा कि मै पानी नही खोला हूँ तब से विकाश सिंह दिलिप सिंह मुझे लात घूसों से मार कर गिरा दिया।
  फिर मै रोते हुए कह रहा था कि मै पानी नही खोला हूँ तो बोले साले तुम ही पानी खोले हो और फिर मारने लगे मै पैर पकड़कर रोते हुए गिड़गिड़ा रहा था कि मै पानी नही खोला हूँ फिर वे बोले कि अगर अब तुम ताल की तरफ जाओंगे तो जान से मार डालूँगा| यह बात सुनकर मै डर के मारे घर गया और पत्नी से आपबीती सुनाया तो मेरी पत्नी ने गाँव के लोगो के यहाँ गए तो मेरा आवेदन थाने में दिया गया तो थाने से दो सिपाही गाँव में आये और पूछ कर चले गए लेकिन कुछ नही बोले।
हम लोग गाँव से 12 लोग थाने पर गये थे तो दरोगा ने पुछा कि आवेदन कौन लिखा है तो हम लोग बता दिये कि मानवाधिकार कार्यकर्ता ने तो हम लोग उनका नम्बर दे दिये। दरोगा साहब ने मानवाधिकार कार्यकर्ता से बात किये दरोगा साहब ने कहा इन लोगो को बुला लो NCR हो जायेगा तो धारा नही लग पायेगा, इसके बाद कार्यकर्ता भी फोन से कहते थे कि वही रहो घर मत आना हम लोग शाम तक थाने में रहे लेकिन दरोगा हम लोगो का FIR नही लिखा|
दरोगा साहब अगले दिन आने के लिए कहाँ जब हम घर आये तो दर्द के मारे कहर रहे थे रात मे नींद नही आ रही थी| रात मे भय बना रहा कि कही वह दबंग व्यक्ति मुझे न मार डाले यह सोच सोचकर मानों रात पहाड़ की तरह हो गयी है| सुबह होने वाला नही लग रहा था किसी तरह रात बिताकर फिर सुबह फुलपुर थाने गये तो दरोगा साहब ने कहाँ कि तुम साले लोग यहाँ से भाग जाओं नही तो तुम लोगो को बन्द कर दुगाँ खाने के लिए पैसा नही है तुम लोग कैसे केश लड़ोगे यह सुनकर मेरे मन में तमाम तरह कि सोच आने लगी कि क्या गरीबों के लिए कानून नहीं है यही हमारे देश का संविधान है कि एक गरीब मुसहर को मारने के बाद दरोगा साहब द्वारा गाली देकर भगा दिया जाता है| थाने से आये फिर मानवाधिकार कार्यकर्ता से बातचीत करके कचहरी एस.एस.पी आफिस चलने का निर्णय लिया गया, वहाँ गये एस.एस.पी आफिस में आवेदन दिया गया लेकिन उस पर कोई कार्यवाही नही हुई अभी भी दबंग व्यक्ति चाहे जब जिसको मारने का मन करता है पुलिस के लापरवाही के वजह से मारपीट कर घुमते है उनके ऊपर पुलिस वाले कोई कार्यवाही नही करते।
अब मै चाहता हूँ कि जो दबंग व्यक्ति मुझे मारे पीटे है उनके ऊपर कानूनी कार्यवाही हो और मुझे न्याय मिले। मै आपको अपनी आपबीती बताकर बहुत हल्कापन महसुस कर रहा हुँ   |                                                                       
संघर्षरत पीड़ित -मुरली मुसहर
साक्षात्कारकर्ता - दिनेश कुमार व प्रभाकर प्रसाद

कानून का उल्लंघन करते हुए मुसहर की जिन्दगी से खिलवाड करना!

आज भी हमारे भारत देश में अतिवंचित समुदाय मुसहर समुदाय के लोगो को अन्याय बिना जूर्म के थाने में बन्द करके व अपने वर्दी की शान में कानून का उल्लंघन करते हुए मुसहर की जिन्दगी से खिलवाड करना व उनके जीवन को बरवाद करने का ठेका ले रखी हैं जिसमें संविधान का पन्ना भी जर्जर होकर आवाज देती है कि आज भी ये खाकी वर्दी बाले पैसे वालो से मिलकर उनकी बातो को मानते है।
आईये ऐसे ही एक पीडि़त की जुबानी से सुने।
मेरा नाम मुन्ना मुसहर उम्र 30 वर्ष मेरे पिता का नाम स्व0 बुझारत मुसहर हैं मेरे परिवार में एक लड़का 2 लड़की व पत्नी रहती हैं। मै ग्राम-लखनपुर, पोस्ट-लखनपुर, थाना-चोलापुर, जिला-वाराणसी का रहने वाला हूँ। मैं गरीब बेरोजगार जाति का मुसहर हूँ, मैं बनी मजदूरी करके बड़ी मुश्किल से अपने बच्चों का भरण-पोषण करता हूँ। फिर भी हम लोगो बडी सुकून से अपने जीवन को हॅसी-खुशी से बिता रहे थे। कि अचानक मेरे जीवन में अन्धेरा सा छा गया। मै 9 अगस्त, 2014 की रात मनहूस दिन कभी नहीं भूल सकता, उस समय मै मैजिक से बनारस कबीर मठ लहुराबीर में बनारस कन्वेशन में जा रहा था जो मानवाधिकार जननिगरानी समिति के कार्यकर्ता द्वारा कार्यक्रम में आने का सूचना दिया था मै खुशी मन से कार्यक्रम में भाग लेने जा रहा था कि चोलापुर थाने के सामने सोनू सिंह, अजय सिंह व थाने के दरोगा, सिपाही मैजिक गाड़ी को रोककर थाने के अन्दर मुझे ले गये और वहाँ हमको भद्दी-भद्दी गाली देते हुए बोले कि तुम यहाँ से अपना घर छोड़ कर भाग जाओं, यह बात कहते हुए सोनू सिंह व अजय सिंह व दो सिपाही हमको मारने-पीटने लगे और बोले कि तुम यहाँ से भाग जाओं नही तुमको फर्जी केस में फसा कर थाने में बन्द कर देगे। यह बात सुनकर मैं डर के मारे काँप रहा था कि कही पुलिस वाले इन लोगो से मिलकर मुझे फर्जी केस में न फसा दे यह सोच-सोचकर रो रहा था कि साहब हम कोई गलत काम नहीं कि यह है साहब छोड़ दो लेकिन पुलिस वाले मुझे भद्दी-भद्दी गाली देते हुए हमे थाने में बन्द कर दिये।
इसके बाद सोनू सिंह व अजय सिंह जे0सी0वी0 को ले जाकर हमारा घर गिरवाने लगे। मैं थाने में सोच रहा था कि कही मेरी पत्नी व बच्चे को भी पुलिस वाले से मिलकर सोनू सिंह व अजय सिंह हमको थाने में बन्द न करवा दे। यह सोच सोचकर हम मेरा दम घुट रहा था। आँखों से आसू रूकने का नाम ही नही रुक रहा था। मन ही मन में सोच रहा था कि कही मुसहर होने व गरीब होने के कारण तो ऐसा नहीं हो रहा हे यह सब सोच रहा था कि शाम के 5:00 बजे एक जीप पुलिस वाले के साथ मेरी पत्नी थाने पर आयी उसे देखते ही मेरे रोगटे खडे हो गये कि मेरी पत्नी को पुलिस वाले क्यों लाये है। थाने में मेरी पत्नी को वाहर बैठाये थे और बोले कि अभी तुम यहाँ बैठो इसके बाद जे0सी0बी लेकर सोनू सिंह व अजय सिंह लखनपुर मुसहर बस्ती मेरे घर पर गये। जे0सी0बी लगाकर मेरा घर गिरवा दिया, मेरी झोपड़ी में रखे सारे सामन को कुअे में डाल दिये, जिसमें मै दिनांक 7/6/2014 को भट्ठा मालिक से 20,000 हजार रुपये एडवांस के रुप में लिया था कि हम आप के यहा 20 जोड़ी मजदूर लाकर ईट पथाई का काम करेगें। इसी बीच दिनांक 7/8/2014 को झोले में रखा पैसा घर का अनाज दो भर की सिकड़ी सब कुछ ले गये घाव की चोंट के कारण मै कही नहीं जा पा रहा था किसी तरह मै गाडी पकड कर रौनाबारी आया वहा के लोग मुझे एस0एस0पी आफिस आवेदन दिलाये के लिए ले गये। जब मैं अपना आवेदन लेकर एए0एस0पी आफिस में गया तो चोलापुर थाना के दरोगा वहा पहले से मौजूद था। उसे देखकर मुझे डर लगने लगा कि कही यहा भी पुलिस वाले मुझे मारने पीटने न लगें। मै किसी तरह हिम्मत जुटा के एस0एस0पी0 को आवेदन दिया। बगल में दरोगा खडा होकर मुस्कुरा रहा था। आवेदन देने के बाद हम रौनाबारी वापस आ गये। धीरे-धीरे एक सप्ताह हो गया इसके बाद मै आई0जी के कार्यालय में आवेदन दिया। लेकिन वहाँ भी कोई सुनवाई नहीं हुई तब मै डर रहा थ कि सोनू सिंह व अजय सिंह कही मेरी पत्नी व मेरे बच्चें को न मार दे।
यह सोच-सोच कर रात में नींद नहीं लगती कुछ खाने का मन नहीं करता हमेशा सोचता हॅू कि मेरे पत्नी मेरे बच्चे किस हाल में होगे यही सब सोच रहा था कि मेरी पत्नी किसी तरह वहाँ से जान बचा कर रौनाबारी मेरे पास आई सब बाते बताते-बताते रोने लगी। उसके साथ मै भी रोने लगा बच्चों व पत्नी की दशा देखते हुए मै परेशान हो गया और सोचने लगा कि क्या हम गरीब को रहने खाने के लिए कोई सुरक्षित जगह नहीं है क्या हम लोग समाज में जीने योग्य नहीं है। क्या हम लोग को हमारा अधिकार नहीं मिल सकता फिर मैं अपने परिवार को सन्तावना देते हुए अपनी आर्थिक स्थिति को सोचते हुए आये कोई पहल नहीं किया अब मै चाहता हॅू कि जो मेरे अधिकार का हनन हुआ है जो दबंग व्यक्ति मेरे परिवार के ऊपर अत्याचार किये है। उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही हो और मुझे न्याय मिले।
मैं आपको अपनी बातो को बताकर बहुत हल्कापन महसूस कर रहा हॅू और आशा कर रहा हू कि हमें न्याय मिले ।
संघर्षरत पीडि़त -   मुन्ना मुसहर
       साक्षात्कारकर्ता   -  प्रभाकर