Thursday, 26 March 2015

दबंग दोवारा गरीब परिवार का घर गिराकर उसको घर से वेघर करना!

आइये उस भारत की संविधान के नियमों का उल्लंघन करने वाली हमारे देश  की भारतीय पुलिस गरीब निर्दोश व्यक्ति को दबंग व्यक्ति के इसारो पर चन्द पैसो की लालच में गरीब बेरोजगार लाचार महिला को जबरदस्ती वर्दी का रौब दिखाकर जमीन से वेदखल करना व उन्हे फर्जी केश में फसाने का ठेका ले रखी है जो भारती सविधान का उल्लंघन करना व कानून कठपुतली बनाने वाली पुलिस व गरीब परिवार के बच्चों, सहित घर से बेघर कर पैसे के बल पर कर्ज से बने बनाये घर को जेसीबी से गिराकर दबंग व्यक्ति को जमीन दिलाने का ठेका ले रखी है।
आइये ऐसी घटना जो गरीब मुसहर महिला की स्व व्यथा कथा उसकी जुबानी सुने।
मेरा नाम माला मुसहर उम्र-36 वर्ष मेरे पति का नाम मुन्ना मुसहर ग्राम-लखनपुर, पोस्ट-लखनपुर, थाना-चोलापुर, जिला-वाराणसी कि मूल निवासिनी हुँ। मेरे घर पर चोलापुर के पुलिस वाले आये और बोले कि तुम लोगों को बड़े साहब बुलाये है, यह सुनकर मैं डरने लगी तब पुलिस वाले गाली देते हुए बोले चलो गाड़ी में बैठो डर के मारे जीप में जाकर बैठ गई वह बच्चें को लेकर थाने में पुलिस वालों के साथ आयी तो देखी थाने के अन्दर मेरे पति मुन्ना मुसहर को पुलिस वाले बन्द किये थे। जब मैं अपने पति से मिलने लगी तो पुलिस वाले मुझे भद्दी-भद्दी गाली दे रहे थे और कह रहे थे कि तुम यहाँ से लेकर इसे भाग जाओ नही तो तुम्हारे पति को फर्जी केश में फसा दूँगा यह कहकर पुलिस वाले अपने गाड़ी से हमारे घर पर छोड़ जब मैं घर पर पहुची तो देखी कि मेरा घर जेसीबी लगाकर गिरा दिया गया है।
यह देखकर मैं रोने, चिल्लाने लगी मुझे लग रहा था, कि हम लोग मुसहर होने के कारण ऐसा तो नहीं हो रहा है। यह सोच-सोच कर गला सुखा जा रहा था और आँखो से आँसु रुकने का नाम नही ले रही थी। वही मेहनत मजदूरी करके घर बनाये थे। उसमें रखे सभी सामाज, आनाज दो भर की सिकड़ी, पायल, नथुनी घर में रखे दो लाख रुपये दिनांक 7 अगस्त, 2014 को भट्ठा मालिक एडवांस के रुप में लिया था कि हम आप के यहा पति/पत्नी व 20 जोडि़या ईट पाथने के लिए मजदूरी करेगें।
इसी बीच सोनू सिंह अजय सिंह हमारे घर में रखे सारे सामान लूट ले गये इसके बाद मेरे पति रौनावारी मुसहर बस्ती में गये और वहां से शिव प्रताप चौबे द्वारा लिखा पढ़ी हुई फिर भी कुछ नही हुआ। मैं अपने बच्चों के साथ लखनपुर बस्ती में ही थी। कि साम के समय सोनू सिंह, अजय सिंह हमारे डेरे पर आकर गन्दी-गन्दी गाली देते हुए कह रहे थे कि तुम यहाँ से भाग जाओ बन्दुक दिखाकर कह रहे थे। तुम सब लोगों को मार डालूगा।
मेरा कुछ नही होगा यह सुनकर रात में खुले आसमान में बच्चों के साथ सोती थी। तो हमेशा भय बना रहता था कि कहीं सोनू सिंह, अजय सिंह आकर मेरे बच्चों को जान से न मार डाले यही सोचते-सोचते सुबह हो गयी। फिर सोनू सिंह, अजय सिंह आये भद्दी-भद्दी गाली देते हुए सोलह सुअर भी बेच दिये आजिविका चलाने का एक माल सहारा था।
उसे भी दबंग व्यक्तियों द्वारा बेच दिया गया में अब क्या करू चोलापुर के थाने के सिपाही व एस.ओ द्वारा दबंग व्यक्तियों द्वारा मुझे घर से वेघर कर दिये इसकी शिकायत वाराणसी वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक से किया गया। लेकिन एस.एस.पी आफिस में चोलापुर एस.ओ को देखे और एस.ओ मुझे देखा तो मुस्कुरा रहा था। तभी मैं समझ गयी कि कुछ नही होगा। इसके बाद आई.जी के यहाँ आवेदन दिया गया जिस पर कोई कार्यवाही नही हुई। मैं निराश हो गयी कि आज की दुनिया में गरीबों की रक्षा करने वाले पुलिस जब दबंग व्यक्ति से मिलकर गरीबों की झोपड़ी गिराने व उन्हे घर से बेघर करके अपनी आप को देश के रक्षक मानते है क्या यही देश के रक्षक है आज भी जब भी घटना को याद करता हूँ तो रोंगटे खडे हो जाता है जब भी पुलिस वालो को देखता हूँ तो गुस्सा आता है लेकिन मैं क्या करू  मजबूर हूँ।
अब मैं चाहती हूँ कि दोषी व्यक्ति के खिलाफ कानूनी कार्यवाही हो और मुझे न्याय मिले। मैं अपनी बातो को बताके मेरे मन को हल्कापन महसूस कर रहा हूँ।

संघर्षरत पीडिता   -   माला मुसहर  
साक्षात्कारकर्ता    - दिनेश कुमार अनल और प्रभाकर 


गरीब असहाय विकलांग परिवार के ऊपर दबंग ब्यक्ति दोवारा उसके जीवन से खिलवाड़ करने !

आज भी हमारे भारत देश में गरीब असहाय विकलांग परिवार के ऊपर दबंग व्यक्ति उनके जीवन से  खिलवाड़ करने का पेशा बना लिए है। उन्हें गरीब व्यक्ति का शोषण व यातना करने में खुशी महसूस होती है। आज हमारे देश में गरीबो को हेय दृष्टि से देखा जाता है। आइये ऐसे पीडि़त विकलांग व्यक्ति की व्यथा उनकी जुबानी सुने।
मेरा नाम बबलू राजभर उम्र 19 वर्ष मेरे पिता का नाम स्व0 फूलचन्द राजभर ग्राम-बसनी पो0 बसनी थाना-बड़ागाँव जिला-वाराणसी का रहने वाला हूँ। मेरे परिवार में मेरी बुढ़ी माँ, भाई व भाभी रहती है। मै बायें हाथ से व पैर से विकलांग हूँ। मै गरीब असहाय बेरोजगार व जाति का राजभर हूँ मेरी माँ प्राथमिक स्वास्थ केन्द्र बसनी में प्रशिक्षित दाई का काम करती है। गरीबी के कारण मै प्राइवेट हास्पिटल पिन्टू पंडि़त के यहाँ झाडू लगाने का काम करता था मुझे काम किये 1 माह हुआ था मेरी मजदूरी नही दिये मांगने पर कहते थे अभी काम करो हम तुम्हारी मजदुरी दे देंगे मै कुछ नही बोलता था अचानक मेरे जीवन में ऐसा हादसा आया कि मै समझ नही पाया जब मै झाडू लगाकर अप्रैल 2014 को नहाने चला गया उस समय हास्पिटल से थोडे दुर विशेकपुर गाव से नहाकर जब मैं हास्पिटल में आया तो सी. पी. सिंह , पंकज, पिन्टू हमें पकड़ लिए और अनायास बिना कुछ कहे मेरी तलाशी लेने लगे, उस समय मै घबरा गया ।
 मेरा पुरा शरीर काँप रहा था कि आखिर लोग पहले हमें मानते थे आज क्या हुआ कि लोग मुझे गाली देकर मेरी तलाशी क्यों ले रहे है। उनके तलाशी लेने पर मेरे जेब से केवल एक नहाने का साबुन निकला था फिर वो तीनों मुझे मारने लगें उस समय मै बहुत डर रहा था पुरा शरीर काँप रहा था जब लोग पुछे कि बताओं 5000 रुपये चुराकर तुम कहा रखे हो उस समय मेरे पैरो तले जमीन खिसक गयी मुझे ऐसा लग रहा था, मुझे बहुत चिन्ता हो रही थी और मेरे होश उड़ गये। जब मै बताया कि साहब हमने कोई पैसा नही लिया उस समय लोग मुझे और तेज से मारने लगे, मै रो-रोकर अपनी माँ को पुकार रहा था और अपने को छोड़ने की गुहार उन लोगों से कर रहा था, लेकिन उन बेरहम व्यक्ति को मेरे विकलांगता पर भी तरस नही आया इतना सब कुछ करने के बाद भी उन्हें संतोष नही हुआ और मुझे कमरे के अन्दर ले जाकर जबरदस्ती कुर्सी पर बैठाकर दरवाजा बन्द कर दिये तथा मेरे सर में सुई भोंक कर ये पुछ रहे थे कि पैसा कहाँ रखे हो, मै बार-बार कहता रहा मै ऐसा काम नही किया जब लोग मेरे सर में सुई भोक रहे थे।
 उस समय मुझे बहुत दर्द हो रहा था और मै दर्द से कहर रहा था सोच रहा था कि कोई भगवान बनकर आये और ऐसे पापी व्यक्ति से मुझे छुड़ाये लेकिन ऐसा नही हुआ वे बेरहम मेरे साथ जातियता करते हुए मेरे कपड़े उतरवा दिये और लिंग में जोर-जोर सुई लगाकर बार-बार कह रहे थे कि मेरा पाँच हजार रुपये दो उस समय दर्द इतना हो रहा था कि मेरी आवाज को सुनकर हास्पिटल व अन्य लोग इक्ट्टठा हुए और बोले की बच्चे को क्यो मार रहे हो यह क्यों चिल्ला रहा है उसी समय मेरी माँ आ गयी जबरदस्ती दरवाजा खुलवायी जब मेरी माँ शोभना देवी जब मेरी दशा को देखी तो जोर-जोर से चिल्लाने लगी मेरी माँ उस समय वहाँ कुछ नही बोली मुझे उठाकर प्राइवेट हास्पिटल प्रमोद डा0 बसनी के यहां ले गयी वहाँ डाक्टर द्वारा सुई दवा मेरी माँ कर्ज लेकर किया, घटना के दुसरे दिन अपने माँ के साथ थाना-बड़ागाँव गये तो वहाँ मेरी एफ0 आई0 आर0 दर्ज किया और मेरा मेडिकल पुलिस द्वारा प्रा0 स्वा0 केन्द्र बसनी द्वारा बनवाया गया और पुलिस के द्वारा दोषि व्यक्ति को दुसरे दिन थाने पर बुलवाया गया जब दोषि व्यक्ति थाने गये तो थाने पर मै और मेरी माँ थाने पर मौजुद थे दोषी व्यक्ति हमे और मेरी माँ को जान से मारने की धमकी दे रहे थे, उस समय हम लोग डर गये मेरी माँ से जाकर पुछे साली एफ0 आई0 आर0 की हो। मेरी माँ बोली मेरे बच्चे को इतनी बेरहमी से मारे और 10000 रुपये की माँग कर रहे हो कैसे कोई गरीब अपने को सुरक्षित समझे पुलिस वाले उन लोगों को एक घण्टे बन्द किये थे और हम लोगों को घर जाने से पहले छोड़ दिये दुसरे दिन दोषि व्यक्ति हमारे घर आये और माँ से बोले हम दवा का सारा पैसा दे देंगे तुम सुलह कर लो लेकिन मेरी माँ सुलह नही कि हमारे घर में सभी भाई बहन विकलांग है मेरी माँ बड़ी मुश्किल से घर का खर्च चलाती है।
आज भी घटना को याद करता हूँ तो मेरे रोंगटे खड़े हो जाते है। मन में चिन्ता बनी रहती है उन व्यक्ति को देखकर आज भी भय बना रहता है। अब मै चाहता हूँ कि मेरे साथ जो दबंग व्यक्ति शोषण किये है उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही किया जाय और मेरे साथ न्याय हो। आप को अपनी आपबीती बताकर बहुत हल्कापन महसूस कर रहा हूँ।
            संघर्षरत पीड़ित  -      बबलू
      साक्षात्कारकर्ता - दिनेश कुमार अनल व प्रभाकर

Friday, 13 March 2015

प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र बसनी में ऐनम द्वारा छुटाछुत के कारण रेफर किया गया !

आज भी हमारे भारत देश में गरीब असहाय के साथ जातिगत भेद-भाव किया जाता है। यहाँ तक कि छुआछुत व भेद-भाव करते हुए गरीब मुसहर को प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र से दवा की सुविधा सुनिश्चित न कराकर उन्हें हास्पितल से बाहर किया जाता है। आइऐ ऐसी ही एक यातना पीड़ित की जुबानी सुने।
मेरा नाम शान्ति देवी उम्र-42 वर्ष मेरे पति का नाम भइया लाल है मैं ग्राम-निन्दनपुर, पोस्ट-खटौरा, थाना-फुलपुर, जिला-वाराणसी की रहने वाली हूँ। मेरे परिवार में चार लड़की, दो लड़के रहते है। मैं जाति की मुसहर महिला हूँ। मैं बनी मजदूरी करके तथा दोना पत्तल करके बड़ी मुश्किल से अपने परिवार का खर्च चलाती हूँ, फिर भी सुख चैन से अपने परिवार के बीच रहती थी। मेरी बेटी सुदामा देवी अपने पति के साथ मेरे घर पर रहती है। उसके पेट में जब बच्चा था तो आँगनवाड़ी द्वारा पोषाहार मिलता था आशा द्वारा आयरन की गोली व टी0टी0 का सुई गाँव में लगाया गया था। उसकी स्थिति ठीक-ठाक थी|
 30 मई, 2014 का वह मनहूस दिन कभी नही भूल सकती कि मेरी बेटी के पेट में दर्द बहुत अधिक हो रहा था तो मैं गाँव की आशा प्रभावती को सूचना दिया सूचना पाकर आशा मेरे घर पर आई और अपने साथ टैम्पो से प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र बसनी ले गयी जिसका भाड़ा मैं 100 रुपये दी जब मैं अपनी बेटी को हास्पिटल लेकर गयी तो वहाँ की ऐनम से आशा व उसके पति बोले कि इसे भर्ती कर लिजिए लेकिन ऐनम बिना जाँच किये व बिना हुए मेरी बेटी को रेफर कर दी और बोली मुसहिन है और साफ-सफाई भी नही है, मैं इसका बच्चा यहाँ पैदा नही करुँगी वह झूठ बोलकर और छुआ-छुट की भावना रखते हुए हास्पिटल से बाहर निकाल दी दस समय हम लोग घबराने लगी कि अब हम अपनी बेटी को कहाँ लेकर जाये उस समय मेरे पास पैसे भी नही थे जबकि मेरी बेटी के बच्चे का उस समय हास्पिटल में सर बाहर निकल रहा था वह दर्द से कराह रही थी उसकी पीड़ा देखकर मैं रोने लगी और ऐनम से हाथ जोड़कर बोली बहन जी हम ऐसे हालात में अपनी बेटी को कहाँ लेकर जाऊगी |
अब आप ही मेरी बेटी का प्रसव करिये तब ऐनम डाट कर बोली कि कबीर चैरा लेकर जाओं उस समय मुझे ऐनम के व्यवहार पर बहुत गुस्सा आया लेकिन क्या करती मजबूर थी। मैं इधर बेटी की दशा देखकर अपने आपको नही रोक पाई मन घबरा रहा था कि मेरी बेटी को कही कुछ हो न जाये मैं कबीरचौरा भी नही देखी थी| मेरे पक्ष में आशा भी बहुत कही लेकिन ऐनम उसकी भी नही सुनी ऐसी गम्भीर हालात में मेरी बेटी को एम्बुलेंश से आशा के साथ कबीरचौरा भेजा गया था मैं घबरा रही थी कि मेरे पास पैसा भी नही है मैं क्या करुगी उस समय मेरे पति भइया लाल 4000/- रुपये 10 रुपये सैकड़े के हिसाब से सुती पैसा लेकर आये जब एम्बुलेंश में बैठाकर बाबतपुर के आगे पहूँचे तो मेरी बेटी का दर्द और बढ़ गया वह जोर-जोर से रो रही थी मैं भी उसकी दशा देखकर रो रही थी जब गाड़ी हरहुआ पहुँची तो एम्बुलेंश में ही मेरी बेटी को लड़का पैदा हो गया बसनी से हरहुआ पहूँचने में 20 मिनट का समय लगा था| उस समय हम लोग आनन-फानन में हरहुआ हास्पिटल में ले गयी वहाँ मेरी बेटी को भर्ती कर लिया गया और तीन दिन तक भर्ती किये थे वहाँ मेरा 4000/- रुपये खर्च हुआ था। जब एम्बुलेंश हरहुआ से मेरी बेटी को लेकर तीसरे दिन मेरे घर आया तो 50 रुपये लिया था। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र बसनी की ऐनम मेरे साथ जातिगत व भेद-भाव आज भी है| हम गरीब मुसहर की सुनवाई सरकारी हास्पिटल में नही होती हम लोगों को धेय दृष्टि से देखा जाता है।
आज की घटना को याद करती हूँ तो मेरे आँख से आँसु आ जाता है। सर में दर्द होने लगता है। मन घबराने लगता है। रात में नीद भी नही आती, ऐनम पर बहुत गुस्सा आता है। अगर मैं उसकी बराबरी की होती तो उसे मुह तोड़ जबाब देती। लेकिन क्या करती मजबूर थी। 
अब मैं चाहती हूँ कि ऐसे ऐनम के खिलाफ कानुनी कार्यवाही किया जाय ताकि ऐसी घटना के दूसरो के साथ न हो सके और ऐसी निष्क्रीय ऐनम को हास्पिटल से बाहर निकाला जाये। अभी 1400/- रुपये का चेक भी नही मिला।
आपको अपनी कहानी बताकर बहुत हल्का पन महसूस कर रही हूँ।
संघर्षरत पीड़िता -  शान्ति देवी
साक्षात्कारकर्ता -  दिनेश कुमार अनल

Wednesday, 12 November 2014

’’एक बार ससुराल वालो का अत्याचार सहकर छोड़ चुकी हूँ दूबारा नहीं’’


महिलायें सदियों से हमारे समाज में प्रताड़ना की शिकार होती रही है। वह जब अपने एक और अधिकार के लिए लड़ती है तो समाज में उन्हे तरह-तरह की प्रताड़ना मिलती है, फिर भी वह इन तमाम मुश्किलो का सामना कर अपनी मंजिल तय ही कर लेती हैं।

मेरा नाम   सुशीला देवी उम्र 32 वर्ष हैं। मेरे पति स्व0 राजकरन पटेल है। मै अशिक्षित हूँ। मै सरकारी प्राथमिक विद्यालय में खाना बनाने का काम करती हूँ। मै ग्राम-नयापुरा, थाना-घुरपुर, ब्लाक-चाका, तहसील-करछना, जिला-इलाहाबाद की रहने वाली हूँ।

मेरा दुबारा विवाह 14 फरवरी, 2005 को स्व0 राजकरन पटेल से हुआ था शादी के बाद से ही मेरे ससुराल वालों द्वारा मुझे सताये जाने लगा। मेरे पति को उन लोगों द्वारा मारा-पीटा जाता था और उन पर यह दबाव बनाया जाता था कि हमे छोड़ दे। मेरे पति की पहली पत्नी को भी ससुराल वालों के दबाव के कारण छोड़ना पड़ा था। मेरे पति का स्वभाव मेरे प्रति अच्छा था। वह हमेशा मेरा साथ देते थे। यह बाते उन लोगों को बर्दाश्त नही होती थी। जिसमें से कुछ जमीन हम लोगों को लिए दी गयी थी। वह जमीन रेलवे में चली गयी। जिसका मुआवजा सरकार द्वारा मिला जिसे मेरे ससुर ने ले लिया था। हमारे पास न अब कोई जमीन थी न ही कोई पैसा। मेरे पति जो बनी मजदूरी करते थे और मै जो कमाती थी उसी से मेरे परिवार का खर्च चलता था।
          
  एक दिन मेरे पति ने मेरे ससुर से कहा बाबूजी दो हजार रुपया हमे दे दिजिए वह कई दिनों तक गिड़गिड़ाते रहे लेकिन उन्होंने एक रूपया भी नहीं दिया। 4 मई, 2013 शनिवार के दिन मै बाबूजी से बोली बाबूजी उन्हें पैसा दे दिजिए वह बहुत परेशान है, तब उन्होंने कहा अभी उसे और तुम्हें बहुत रोना और परेशान होना है। यह बात कहकर वह कही चले गये। रविवार को भी बाहर रहे। सोमवार के सुबह मेरे पति मुझसे चाय पीने के लिए कुछ पैसा माँग रहे थे। मैने अपने टोक में से दस रुपये का नोट छोड़ कर दिये। वह चाय के पीने चले गये। कुछ देर बीत गया समय बहुत ज्यादा होने लगा तब आस-पास वालो से पूछे भईया मेरे पति को देखो हो। तब सबने यही जबाव दिया नही आते होगे उनका इन्तजार करते-करते शाम हो गयी। इस समय मेरा दिल घबराने लगा। हम बिना खाये-पीये इन्तजार करती रही। पता नहीं उस दिन मन के अन्दर से बहुत बेचैनी हो रही थी। देखते-देखते शाम हो गयी। मै अपने घर पर ही थी तभी गाँव के ही एक लोग आये बोले तुम्हारा आदमी खत्म हो गया।

मुझे उस समय कुछ समझ में नहीं आ रहा था। यह बात सुनते ही मै पागलो की तरह बाहर दौड़कर उसके पास आयी, तो घर के बाहर उनकी लाश पड़ी थी, उनके आँखों से खून निकल रहा था। ऐसा देखकर लग रहा था कि अभी कुछ समय पहले उसके साथ कोई र्दुघटना हुई है। मैं भर निगाह देख ही नही पायी कि मेरे ससुर ने मुझे ढकेल दिया और ले जाकर कमरे मे बन्द कर दिया। मै उनसे रोती गिड़गिड़ाती रही मुझे मै कही उन्हे अपने आखों से जीभर कर देख लेने दिजिए लेकिन वह एक भी नहीं सुने उनके सभी रिश्तेदार और आस-पास के लोग देख रहे थे। किसी ने हमारी ममद नही की मुझे बाहर से सिकड़ी लगाकर वह लोग मेरे पति की लाश लेकर चले गये, पता नहीं उन लोगों ने उनका कफन दफन किया था या नहीं। मेरे ससुर ने अपने रिश्तेदार और दामाद को पहले से खबर दे दी थी। मैं अन्दर से रोती चिल्लाती रही किसी ने मेरी एक भी नही सुनी। इनकी मौत की खबर मेरे मायके वालो को भी नहीं दी। कुछ देर बीत जाने के बाद तब पास के ही लोगों ने दरवाजा खोला। मैं उस समय रोती गिड़गिडाती रही लेकिन मेरा आँसू पोछने वाला कोई नही था। मै अपने आपको अकेला महसूस कर रही थी। जब उन लोगो ने मुझे बन्द किया था तो उस समय ऐसा लग रहा था कि कैसे बाहर आ जाऊॅ कोई भी जल्दी से दरवाजा खोल दे मै तड़प रही थी। अभी भी उस बात का दुख है आखिरी बार उन्हें जीभर के देख नहीं पायी।

            मेरे ऊपर इतनी बड़ी आफत आयी थी किसी ने मुझे सहारा नही दिया। दुसरे दिन पास-पड़ोस के मदद से मायके खबर भेजी व लोग आये तब मुझे ले गये।

            मेरे पति जब घर से निकले थे सही सलामत थे उनकी साजिश कर हत्या करायी गयी। पुलिस ने भी इस मामले की जाँच नहीं की उनकी एक्सीडेन्ट से मौत हुई थी। इस बात का भी जाँच नहीं हुई। मैने घुरपुर थाने में एक प्रार्थना पत्र दिया कि मेरे पति की मृत्यु कैसे हुई इस मामले की जाँच हो। तब वहा भी पैसा देकर मेरे ससुर ने मामले को रफा-दफा कर दिया। मुझे यह समझ में नही आ रहा था कि मेरे ससुर अपने बेट की मौत पर अपना मुँह क्यो बन्द किये है।

            कुछ दिन मायके रहकर दौड़ धूप किया कोई हल नहीं मिला फिर वापस अपने ससुराल काम करने चली गयी। कुछ दिन तक ठीक रहा फिर मेरे ससुर ने परेशान करना शुरू कर दिया। वह मुझे डराने धमकाने लगे कि यहा से भाग जाओ नही तो तुम भी मर जाओंगी यह सब सुनकर मेरा मन बहुत घबराने लगा पहले तो पति का सहारा था, जब वह हमे मारते और हमारे ऊपर अत्याचार करते थे। हमें घर से भगा देते थे। तब हम लोग चुपचाप घर छोडकर अपने मायके चले आते कुछ दिन गुजार कर फिर वापस चले जाते आये दिन मेरे जेठ और उनका लड़का मेरे पति को मारता रहता था। तब हम दोनो एक दुसरे कर सहारा बनते थे। अब तो मै बिल्कुल अकेली पड़ गयी हूँ। कहा जाऊॅ मायके वाले भी गरीब है पिता के गुजरने के बाद माँ बीड़ी बनाकर गुजारा करती है। एक भाई है जो मजदूरी करता है अभी दो बहनो के शादी की जिम्मेदारी भाई पर ही है। अगर उनके पास जाती हूँ। तो मै भी उनके ऊपर बोझ बन जाऊगी। यही सोचकर मैं अपने ससुराल मे ही उनके अत्याचार सहते हुए रहने लगी। दिन पर दिन वह हमे धमकाने लगे कि छोड़कर चली जाओ नही तो मुझे भी मारी जाओगी जब यह सुनती थी तो बहुत तकलीफ होता था रोती थी मन में डर भी था कि हमे अकेला पाकर वह लोग मार न डाले लेकिन मन में यही ठान लिया कि अब मै दुखियारी को अपनी लड़ाई लड़कर यही अपना जीवन गुजर बसर करना है। भगवान ने मेरी बड़ी परीक्षा ली है। एक बार ससुराल वालो के अत्याचार से छोड़कर चली आयी लेकिन अब दुसरी बार उनके अत्याचार को नही जाऊगी। मैने एक मानवाधिकार संस्था की दीदी की मदद से प्रोबेशन कार्यालय में प्रार्थना पत्र दिया। वहा हमारी और ससुर की पेशी हुई। वहा भी अधिकारी के सामने ससुर ने हमारे अपना हक हिस्सा देने से इन्कार कर रहे थे। वह वहा भी हमे झूठा ठहरा रहे थे। अधिकारी सर से उन्होंने मोहलत ली की हम कुछ दिन बाद बताये गे। 11 दिसम्बर, 2013 को तारीख मिली। अधिकारी कार्यालय से घर जाने के बाद वह मुझ पर तमाम आरोप लगाने लगे। गन्दी-गन्दी गालिया देने लगे और कहने लगे की हम हिस्सा नहीं देगे। चाहे जो कर लो उनकी बात मै चुपचाप सहती रही अन्दर से डरती रही कि फिर कुछ मेरे साथ अनहोनी न करे।

            जब अगली तारीख पर हम प्रोबेशन कार्यालय गये तब मेरे ससुल वहा दो वकील लेकर गये थे। वह मुझ पर तमाम आरोप लगा रहे थे। लेकिन वहाँ पर हमारे हक में फैसला किया गया। ससुर ने जून, 2014 में खेत को तीन हिस्से में बराबर बटवारा किया। कुछ पैसा बैंक में फिक्स है पूरा होने पर उसमें भी हक देने की बात कही है। मुझ दुखियारी को इससे बहुत राहत मिली है। समय का इन्तजार है खेती बारी मिलने पर मै उसमें उपज कर अपना जीवन गुजार सकेगी। मेरे पास कोई बच्चें नहीं है कम से कम इसके सहारे मै अपनी जिन्दगी बिता सकती हूँ।

            अभी भी डर लगता है। रात को नींद नहीं आती है पति की हमेशा याद आती है एकदम अकेला महसूर करती हूँ। मन हमेशा अशान्त रहता है। मन में थोड़ी सी आशा जगी है।
            मैं चाहती हूँ जो मेरे ससुर ने कबुला है वह एक हिस्सा मुझे मिले। जिससे मेरे साथ न्याय हो।

सघर्षरत पीड़िता     _        सुशीला देवी
 
साक्षात्कारकर्ता     _      फरहद शबा खानम्
                                   

                                     

Tuesday, 11 November 2014

मैं अपने इज्जत का बदला जरुर लूंगी


अभी भी हमारे समाज में कुछ ऐसे लोग है जो रिस्ते के नाम पर कलंक माने जा रहे है। ऐसे ही कुछ रिस्तों की कहानी इस बच्ची की जुबानी सुने।

मेरा नाम मोनिका उम्र-18 वर्ष है। मेरे पिता का नाम बुच्चुन है। मैं जाति की मुस्लिम हूँ। मेरे माता जी का नाम हदीसुन है। हम लोग चार भाई चार बहन है। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नही है। मैं ग्राम-नथईपुर, पोस्ट-कुआर बाजार, थाना-फुलपुर, जिला-वाराणसी की निवासी हुँ।

मेरे पिता जी शादी मे बैण्ड पार्टी का काम करते है। यह घटना 9 अप्रैल, 2014 की जब मैं बी0ए0 प्रथम वर्ष की परीक्षा देकर घर लौट रही थी, तभी मेरे बड़े पिता जी का बेटा सद्दाम कालेज के पास देखने आया। परन्तु मुझे लड़कियों के समुह में देखकर चला गया। तब मैं इस बारे में कुछ समझ नही पायी पर जैसे ही मेरी सभी सहेलियां चली गयी और मैं पैदल अपने घर के तरफ जाने लगी तभी सद्दाम व उसका एक मित्र गोपी विश्वकर्मा के साथ काले रंग की बाइक से आया मेरा हाथ पकड़कर गाड़ी पर बैठाने लगा मैं घबरा गयी जब मैंने विरोध किया उसने सड़क पर में एक लात मारा और मेरा हाथ पकड़कर खीचा और मै तेज मैं चिल्लाती उतना तेज मुझे सब मारते और कहते थे कि आज चिड़िया जाल में फ़सी है। इसको छोडुगा नही। दोपहर का समय था रोड़ पर सन्नाटा छाया हुआ था। इसलिए वो सब मेरे साथ जितना मनमानी करते बना किये मेरा ड्रेस तक फाड़ दिये जब मैं कुछ बोलती तो सब मारने लगते थे। इतना ज्यादा सब मारे थे कि खुन निकलने लगा। मुँह, नाक से हाथ दोनों लाल हो गया। मेरे दोनों पैर पर भी मार का निशान पड़ गया। मैं जो कालेज का यूनिफार्म पहनी थी। वह फट गया दुपट्टा अस्त व्यस्त हो गया, कपडे़ पर खुन के निशान लग गये फिर भी वह मुझे घसीट ही रहे थे तथा मना करने पर मारने जा रहे थे। जब मुझे वह बिठा के बाइक पर ले जाने में असफल रहे तो वह मुझे उसी हालत में छोड़कर भाग गये तथा थोड़ी देर बाद कुछ लोग आये और मुझे घर पहुँचाया।

उन लोगों ने मुझे इतना मारा था कि मैं तीन दिन तक पं0 दीनदयाल चिकित्सालय में भर्ती थी। इसके बाद कुछ ठीक हुई तो मैं तुरन्त फुलपुर थाने में गयी और पुुरी घटना के बारे में जानकारी दी । लेकिन पुलिस ने मेरी बातों को अनसुना कर दिया और दोषियों पर कोई मुकदमा दर्ज नही किया। बल्कि मेरे ही बयान को उल्टा करके कुछ महत्वपूर्ण तथो को हटा दिया। पुलिस के इस रवैये से दोषियों का हौसला बुलन्द हो गया और वह मुझे लगातार धमकी दे रहे है कि इस बार तो केवल हाथ, पैर ही टुटे है। अगली बार लाश जायेगी। गोपी विश्वकर्मा एवं उसकी माँ शीला विश्वकर्मा राजनीतिक पार्टी सपा से अपने संबधों का हवाला देकर डराते है तथा पुलिस वालों भी इन लोगों के दबाव में कोई कार्यवाही नही कर रही है।

हम चाहते है कि जिस तरह मेरे इज्जत के साथ खिलवाड़ किये है। उसी तरह उन सबको भी सजा मिले। जब तक मैं उनको सजा नही दिलवा लेती मैं चुप बैठने वाली नही हूँ।

बाहर जब मैं निकलती हूँ तो बहुत शर्म लगता है, लोग देखकर काना-फुसी करने लगते है। मन करता है बस एक कमरे में छुपकर बैठी रही हुँ। किसी से बात चीत करने का मन नही करता पढ़ने में भी मन नही लगता जैसे सर पर बोझ सा रखा हुआ है। पता नही आगे की पढ़ाई कैसे होगी माता-पिता भी हदस गये बाहर निकलने नही देगे। आपको अपनी घटना बता कर बहुत हल्का पन महसुस कर रही हुँ। क्योंकि कोई भी मेरी बातों को इस तरह सुना ही नही लोग देखकर नजर फेर लेते है।

संघर्षरत पीड़िता % मोनिका       
साक्षात्कारकर्ता % छाया कुमारी


Thursday, 3 July 2014

संघर्षरत पीडि़त की स्व0 व्यथा कथा।

आज भी हमारे देश की पुलिस व प्रशासन मुस्लिमों को गिरी हुई निगाहो से देखते हुए उन पर फर्जी मुकदमा व उनके ऊपर जुल्म करने का ठेका ले रखा है। यहाँ तक कि आदमी ही आदमी को अपना शिकार बना रहा है। समुदाय के दबंग व्यक्ति भी अपने लोगों के ऊपर जुर्म व अत्याचार कर रहे है। आइये ऐसे ही एक पीडि़त व्यक्ति की स्व0 व्यथा कथा उसके जुबानी सुना रहा है। मेरा नाम अब्दुल समद है उम्र 40 वर्ष है। मेरे पिता का नाम श्री सौकत अली ग्राम-कुड़ी पोस्ट-कुड़ी थाना व ब्लाक-बड़ागाँव लहसील-पिण्ड्ररा जिला-वाराणसी का रहने वाला हूँ। मैं 5 भाई तथा 3 बहने है। जिसमें 3 भाई व 3 बहन की शादी हो चुकी है। 3 भाई अपने परिवार के साथ अलग रहते है और 2 भाई मेरे पिता जी के साथ रहते है। मेरे परिवार में कुल 9 सदस्य है। जिसमें में अब्दुल समद पत्नी ताहेरा बानो और एक लड़का तथा 6 लड़की है। जिसमें मेरे भाई का नाम आजाद अली गुड्डू अहमद रजा मेराज हुसैन सिकन्दर हैं यह घटना 7 फरवरी 2013 का है। जब हमलोग ने बिजली का कनेक्शन कराया जो निम्न लोग है। मोहम्मद युसुफ मो0 अली, उर्फ छेदी निजामुद्दीन (साई) सौदागर (नाई) अहमद रजा उर्फ गुड्डी इन लोगों का कनेक्शन कराकर बिजली विभाग के जे0ई (यादव जी) को दिया गया। इसके बाद जे0ई0 साहब लाइन के लिए मोटा केबिल का तार पास कराये और जुबानी गारेन्टी भी तार का 50 वर्ष का दिये कि ये तार खराब नहीं होगा। जब वो तार खिचावाने के लिए अन्य कर्मचारी के साथ आये तब मुनीब ईशा इरशाद तार खीचाने के लिए रोकने लगे। जे0ई0 साहब जब इन लोगों को समझाने लगे तो ये लोग जे0ई0 की बात नहीं माने तो हम लोग शान्त होकर बैठ गये। जब मुहम्मद अली उर्फ छेदी ने अलीरजा से कहे की दादा हमको लाइन ले जाने दीजिए। कहिये तो हम लोग जे0ई0 से कहकर ऊपर से या जमीन खोदवाकर पाइप के द्वारा खिचवा ले। लेकिन अली रजा ने तार को खीचनें नहीं दिया। फिर अली रजा ने कहा कि मै इसका मालिक नहीं हूँ। इसका मालिक सईद रजा उर्फ छेदी है। उनसे पूछ लीजिए। मुहम्मद अली ने कहा ये आपका जमीन है। मै उनसे पूछने नहीं जाऊॅगा। सईद का दुकान सड़क पर किराना का है। जब सईद 9 फरवरी 2013 को रात में करीब 7:00 बजे दुकान बन्द करके घर पर आ रहे थे। उस समय रास्ते में सईद व मुहम्मद से कहा सुनी होने लगा। इसके बाद दोनों में मार-पीट होने लगा। सईद के साथ उसका लड़का भी था। मार-पीट करते-करते फाइरिंग भी हो गयी। जिसमें सईद उर्फ छेदी की गोली पीठ पर जाकर लग गयी। लेकिन कट्टा बरामद उनके बेटे पिन्टू के पास से हुई। लेकिन मुहम्मद अली उर्फ छेदी वहाँ से भाग गये। जब नियाद अहमद ने इसकी सूचना बड़ागाँव थाना को दी तब थाने से एक गाड़ी पुलिस मौके पर पहूँची। जब पुलिस मुहम्मद अली के घर गयी। तब पुलिस द्वारा पूछ-ताछ करके वापस रोड़ पर आयी तो नियाज नेता के बताने पर 8:30 बजे रात को वापस होकर गुड्डू व गरीब के घर गयी। तब सब लोग घर छोड़कर भाग गये। उसके बाद पुलिस चली गयी। कुछ समय के बाद नियाज नेता ने थाने में जाकर मुहम्मद अली उर्फ देछी गुड्डू व गरीब तीनो लोगों के खिलाफ थ्प्त् दर्ज़ करा दी। जब पुलिस इनको पकड़ने के लिए आती तो मौके पर न पाकर उनके माता व पत्नी और बच्चों को भद्दी-भद्दी गाली देते हुए चले जाते थे और हम लोगो को धमकी देते थे कि उन लोगो को बुला लो नहीं तो तुम लोगों को ले जाकर थाने में बन्द कर देगे। जब पुलिस काफी दिनों तक नहीं पाये तो दिनांक 19 मई 2013 को गुड्डू व गरीब के घर की कुड़की का आदेश दे दिया। हमको जब इस बात का पता चला तो हम उसे ढुढ़कर कचहरी ले जाकर पेश कर दिया और दोनो का वयान दिलवाकर कचहरी से जमानत करवाकर घर ले आये। फिर दोनों को उसी समय मुम्बई भेज दिया। मु0 अली तो पहले से फरार चल रहा था। फिर अचानक मु0 अली उर्फ छेदी दिनांक 4 मई, 2013 को कही से आ गया। वह आने पर 7 बजें शाम को 4 (चार) राउण्ड गोली चलाया लेकिन किसी को भी एक गोली नही लगा और वह गोली चलाकर लालधारी राजभर के घर में जाकर छिप गया तब सईद हफीज अन्य लोगों के साथ लालधारी राजभर के घर जाकर कहा कि मुज्लिम को हमारे हवाले कह दो। तब लालधारी ने कहा की हम इसको पुलिस के हवाले करेगे। तुम लोगों को नहीं देगें। तब उसने बड़ागाँव थाने में मोबाइल के माध्यम से खबर दिया। यह खबर किसी ने कपसेठी थाने में भी दे दी। जब दोनो थानो की पुलिस आयी तो भीड़ को समझा बुझाकर हटाया और फिर बड़ागाँव की पुलिस ने मु0 अली उर्फ छेदी को जीप में बैठाकर अपने साथ थाने लेकर चली गयी और डंडे व पट्टे से बहुत मारे और बार-बार पूछ रहे थे तथा भद्दी-भद्दी गाली देते हुए पूछे तुमने उस पर गोली क्यो चलाई लेकिन वह कहा की साहब गोली तो उसी के पिस्टल से चली थी। इसके बाद इधर सईद हफीज चिल्लाकर कह रहे थे कि गुड्डू व गरीब था यही कहते हुए लोग बल्लम गड़ासे के साथ डंडा लेकर गुड्डू व गरीब के घर की तरफ चल दिये और चिल्लाते हुए कहे की गरीब अब्दूल का घर फूक दो। जब हम लोग यह आवाज सुने तब हम पांचो भाई डर के कारण घर छोड़कर भाग गये। तब उन लोगों ने घर पहूँचकर हमारे पिता, पत्नी व बच्चों को गाली दिये और मारना-पीटना शुरू कर दिये और फिर मिट्टी का तेल छिडक कर हमारे घर में आग लगा दिये। जिससे हमारा 4-5 लाख का सामान व नगदी रुपया भी जल कर नष्ट हो गये। जिसमें साड़ी का 8 करघा भी था व दो कालीन का करघा भी था। जिसमें एक करघा की कीमत लगभग 18-20 हजार रुपये है। जिसमें कपड़ा आलमारी बेड़ तक्था चारपाई टी0वी रजाई गद्दा व गहना में 4 जेव सोने का हार मांगटिका इत्यादि थे और फिर गुड्डू के कमरे जाकर दरवाजा तोड़ दिया । उसमें से 1 लाख की रकम जिसमें 4 जेब, मांगटिका सोने का घर व 1.5 लाख नगद सब उठा ले गये और जो समान बचा फ्रिज कुलर आलमारी टी0वी बेड सब तोड़कर आग में जला दिये और फिर सब लोग भाग गये। तब हमने 100 नम्बर पर फोन किया तब 9:00 बजे पुलिस आयी। जिसमें मिथिलेश मिश्रा एस0ओ में दमकल को बुलाकर आग पर काफी समय के बाद काबु पायी। जब आग बुझ गयी। तब हम एस0ओ के साथ जाकर थाने में 14 लोगो के साथ एफ0आई0आर दर्ज करायी। जिनके नाम निम्नवत है। 1 नियाद अहमद आरीफ वासीफ ईजाज आजाद इम्तियाज मुमताज गुलाम सरवर, हफीस मुस्ताक मैनुद्दीन जिव्राइल करीमुद्दीन इसास अहमद इत्यादि। इसमें से इजाज आजाद व इम्तियाज की गिरफ्तारी हो गयी। लेकिन अन्य लोग अभी तक फरार है। पुलिस उन लोगों के खिलाफ आज तक कोई कार्यवाही नहीं की। जब हम थाने पर जाते है तो कहते है कि तुम सुलह नामा कर लो इसी में तुम्हारी भलाई है और पुलिस बिपक्षी पार्टी से पैसा लेकर इस केस को दवाने की कोशिश कर रही है। पुलिस हम लोगों को बार-बार परेशान करती है और कहती है की तुम गुड्डू व गरीब को बुला दो नही तो तुमको ही बन्द कर देगे। हम डर के कारण गुड्डू व गरीब को बुलाकर 7 अगस्त, 2013 को कचहरी में पेश कर दिया। तो वही से पुलिस उन लोगो को चैकाघाट जेल में बन्द कर दिया। उसके बाद पता चला की इनके ऊपर गुण्डा एक्ट का भी धारा लगा है। जो हमारा घर जलाया गया है। आज तक पुलिस कोई कार्यवाही नहीं की। इस घटना से हमारे बच्चों व परिवार पर काफी असर पड़ा है और सभी परिवार सदमें का शिकार हो रही है। रात को नींद नहीं आती हमेशा बेचैनी बनी रहती है। मानसिक तनाव काफी बना रहता हैं। अपनी बात बताकर मन हल्कापन महसूस कर रहे है। की काई दर्द मेरा बाट रहा है। हम चाहते है कि दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा मिले और पुलिस दोषियो के खिलाफ भी कार्यवाही हो और हमारा जो सामान नुकसान हुआ है उसका मुआवजा भी मिले तथा साथ ही न्याय भी मिले। पीडि़त का नाम- अब्दुल समद

Tuesday, 24 June 2014

वह रात मैं अपने जीवन में कभी नही भुल सकता

आज भी हमारे देश में गरीब असहाय लोगों को पुलिस ने कानून को खिलौना समझते हुए फर्जी केसो में फॅसाने का ठेका ले रखी है। आइऐ ऐसे पिडि़त की स्वः व्यथा कथा उसकी जुवानी से सुने। 

मेरा नाम अक्कर मुसहर उम्र 38 वर्ष मेरे पिता का नाम स्वः मखडू मुसहर ग्राम-खड़कपुर, पोस्ट-झंझौर, थाना-फूलपुर, जिला-वाराणसी का रहने वाला हू¡। मेरे परिवार में मेरी एक लड़की और मेरे बडे भाई व भाभी रहते है। मैं ईट भट्ठे पर मजदूरी का काम करता हू। जो मजदूरी मिलता है उसी से घर का खर्च बड़ी मुस्किल से चलाता हू। फिर भी पूरे परिवार सहित सुकून से रहता था कि मेरे जीवन में अचानक अन्धेरा सा आ गया। 

मै सन् 2008 की वह मनहूस रात मै अपने जीवन में नही भूल सकता। उस समय मै अपने ससुराल सत्तनपुर मंs था। उस समय रात के 9 बज रहे थे, कि दरोगा भुल्लन यादव दो जीप में कई पुलिस के साथ आ गये। उस दिन मैं लच्छीरामपुर रिस्तेदारी में गया था, उस जगह पुलिस का मुखवीर हैदर अली भी मौजूद था, जब मै अपने रिस्तेदारी में खाना खा रहा था कि रात के 10 बजे भुल्लन दरोगा 20 सिपाहियों के साथ आये और मुझसे मेरा नाम व पता पूछे मै साफ-साफ उन्हे बता दिया तो मुझे बिना कुछ बताये जबरजस्ती अपने जीप में बैठा लिए और मुझे कैण्ट थाने लाये। उस समय पुलिस के व्यवहार को देखकर मुझे बहुत डर लग रहा था। मेरा पूरा शरीर डर के मारे काप रहा था, और मेरा हलक सुखा जा रहा था। घर परिवार की बहुत याद आ रहा थी। डर के मारे मुझे कुछ बोलने व पूछने की हिम्मत नहीं हो रही थी। 

पुलिस वाले जबरजस्ती मुझे थाने में बन्द कर दिये रात भर मुझे थाने के अन्दर बन्द रखे उस समय थाने में मच्छर भी बहुत लग रहे थे। सारी रात मै बैठकर बिताया थाने में शौचालय से बहुत बदबू आ रही थी। मुझे एक भी कम्बल या चादर नहीं दिया गया था, और ना हीं मुझे कुछ खाने को दिये थाने में मै परिवार की स्थिति परिस्थिति के बारे में सोच-सोच कर सारी रात रोता-बिलखता व गिडगिडाता रहा। लेकिन पुलिस वाले मेरी एक भी नही सुने और ना हीं पुलिस वालो को मेरे ऊपर दया आई। मै समझ नहीं पा रहा था कि हमने कौन सी गलती किया है। जो पुलिस वाले मेरे साथ ऐसा व्यवहार कर रहे है। जब सुबह हुआ तो पुलिस मेरे उपर 2 किलों गाजा दिखाकर मेरा चलान कर दिये और मुझे दो पुलिस अपने साथ लेकर कचहरी वाराणसी में लाये वहा मेरा जमानत मंजूर नहीं हुआ उस समय मेरे परिवार के एक भी लोग नहीं थे। मैं बहुत डर रहा था कि पुलिस वाले मुझे फिर अपने साथ चैकाघाट जेल में ले गये। 

15 दिन बाद मुझे चैकाघाट जेल से तलब करके कचहरी कोर्ट में लाया गया वहाँ मेरे ऊपर पुलिस वाले एक और आरोप लगा दिये कि जलालपुर में कोई एक राजभर का हत्या कर दिये हो। उसका आरोप मेरे ऊपर लगाते हुए धारा 396/302 के तहत मुकदमा कर दिये वहा मुझे कुछ पता नहीं था और न ही मै उस हत्या के बारे में जानता था। मुझे पुनः चैकाघाट जेल में लाया गया। जेल में मेरे साथ जातिगत भेद-भाव भी किया जा रहा था और मुझे से शौचालय साफ करवाया जा रहा था। जेल की चार दिवारो में घुट-घुट कर अपने परिवार के बीच की हर बातो व यादो को सोचते हुए मेरे आखो से आसू आ जा रहा था। मै सोचता था कि कैसे मैं अपने परिवार के पास पहुँच जाऊ। मैं उनको एक झलक देख लू। लेकिन मैं मजबूर व चार दिवाल में बन्द था। बातो व यादो को सोचते हुए मेरे आखो से आसू आ जा रहा था मै सोचता था कि कैसे अपने परिवार के पास पहूच जाऊ उनको एक झलक देख लू। लेकिन मै मजबूर व चार दिवारों में बन्द था। मेरे साथ भुल्लन दरोगा बहुत अत्याचार किये इतने अत्याचार के बाद भी उनका जी नहीं भरा मुझे पन्द्रह दिन के बाद फिर कचहरी कोर्ट में लाया गया और मेरे ऊपर झंझौर के मटक पंण्डित की हत्या का केस का भी मुकदमा लाद दिये। मै उस समय चैकाघाट जेल में था। उस केस बारे में मुझे जरा सी भी जानकारी नहीं था मै निर्दोश था, फिर भी मेरे ऊपर केस पर केस लादते गये। मै समझ नहीं पा रहा था कि आखिर हमने इनका क्या बिगाड़ा है। जो मेरे साथ इतनी जातियता करते हुए मेरे जीवन से खिलबाड कर रहे है। इतना कुछ करने के बाद भी भुल्लन दरोगा का पेट नहीं भरा। मुझे फिर चैकाघाट जेल में लाया गया जेल में भी चोलापुर एस0ओ0 से बात करके तलब किया गया और गैंगेस्टर जैसी धारा लगाया गया। 

उस समय मै बिल्कुल टूट सा गया था कि मैं आत्म हत्या कर लू। मेरा जीवन जीने की सोच खत्म हो गयी थी। मै बिल्कुल अपने जीवन से हार मान चुका था। जेल में परिवार की याद बहुत आ रहीं थी। मेरे आखो के सामने उनकी सूरत बराबर नाचती थी। मै पुलिस वालो की जातियता से व उनकी निर्देयता से जेल में सात साल तक था। उस बीच मेरे घर की स्थिति बिल्कुल खराब हो गयी थी, मेरे घर मे एक अन्य का दाना नहीं था। मेरी पत्नी भी मुझे छोड़कर कही चली गयी। जेल में जो खाना मिलता था, वह बहुत अच्छा नहीं था मै पेट भर खाना कभी नहीं खाया। मेरे आखो के आँसू सुख गये थे। मेरे परिवार की चिन्ता बराबर बनी रहती थी, रात में नींद नहीं आती थी। मेरा बड़ा भाई भोनू मुसहर बड़ी मुस्किल से रीन कर्ज लेकर 8 साल के बाद सिविल कोर्ट से मेरा जमानत कराये। जब मै अपने भाई व बच्ची को देखा तो अपने आप को रोक नहीं पाया और फुट-फुट कर रोने लगा। मेरा बड़ा भाई मुझे अपने सीने से लगा लिया मेरी आखे पत्नी को देखने के लिए तरस रही थी। जब पत्नी के बारे में पता चला तो बिल्कुल अपने आप को नहीं सम्भाल पा रहा था। ऐसा लग रहा था कि अपना भी जान दे दू। लेनिन बच्ची की चिन्ता के कारण कुछ भी करने से विवश था। भाई द्वारा मुझे बहुत समझाया गया फिर धीरे-धीरे अपने आप को सम्भाला और उनके साथ घर आ गया। 

पुलिस वालो की मनमानी से मेरा घर परिवार सब कुछ बर्वाद हो चुका था। फिर भी अपने कलेजे पर पत्थर रखकर मैं अपनी छोटी बच्ची के साथ सुकुन से रह रहा था, लेकिन पुलिस वालो का डर व भय बराबर बना रहता था। रात में नींद नहीं आती थी, डरावन सपना हमेशा दिखता था। उस समय मैं उठ कर बैठ जाता था और सारी रात जागता रहता था, इतना सब कुछ होने के बाद भी पुलिस फिर 2011 में मेरे घर छापा मारे उस समय मेरा बड़े भाई घर पर मौजूद थे। फूलपुर एस0ओ0 मेरे बड़े भाई से मेरा पता पूछे मै पुलिस वालों से इतना डर गया था कि घर पर नहीं रहता था। मै अपनी बहन के यहा पर सहनी त्रिलोचन में रहता था वहाँ मुखवीर के द्वारा नरायन सिपाही पहॅूचे और मुझे पकड़कर फूलपुर थाने लाये और बिना कुछ बताये थाने में बन्द कर दिये। मैं पहले से इनता डर गया था कि मँख से बोली नहीं आ रही थी। डर के मारे कलेजा बिहर रहा था, थाने में मुझे माँ-बहन की भद्दी-भद्दी गाली देकर बहुत मारे-पीटे जिससे मेरे सर व पैर तथा पीठ के निचे बहुत चोट आयी। मै दर्द के कारण जोर-जोर से चिल्ला-चिल्लाकर छोड़ देने की गुहार कर रहा था। लेकिन उन्हें जरा सा रहम नहीं आया, मुझसे गजोखर के साधु के हत्या का आरोप लगा कर धारा 460,307,25 व कट्टा दिखाकर मेरा चलान 4 दिन बाद किये मुझे पुलिस वाले कचहरी लाये, मेरा जमानत मंजूर नहीं हुआ फिर मुझे चैकाघाट जेल भेज दिया गया। 

उस समय पुलिस वालो पर बहुत गुस्सा आ रहा था। 24 महीने जेल में रहने के बाद बड़ी मुस्किल से मेरा जमानत मंजूर हुआ और मै घर आया। आज मै घटना को याद करता हॅ तो पुलिस वालो पर बहुत गुस्सा आ रहा था। पुलिस वालो का डर व भय बना रहता है। अभी भी चिन्ता बराबर बनी रहती है। रात में नींद नही आती, खाने का मन नही करता, भूख भी नहीं लगता। अब मै चाहता हॅू कि जो मेरे ऊपर फर्जी केस लगाये गये है उसे खत्म किया जाय और मुझे न्याय मिले आपको अपनी व्यथा कथा बताकर बहुत हल्का पन महसूस कर रहा हॅू। 

संघर्षरत पीडि़त अक्कर मुसहर